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- Syed Ata Hasnain’s Column: The Capability To Strike—and The Prudence To Halt
6 घंटे पहले
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सैयद अता हसनैन, बिहार के राज्यपाल और कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर
ऑपरेशन सिंदूर के एक वर्ष बाद अगर हम उससे मिलने वाली सबसे बड़ी सीख के बारे में सोचें, तो न तो वह हमले की सटीकता है और न ही उसके क्रियान्वयन की गति, बल्कि वह वो रणनीतिक स्पष्टता है, जो इसका आधार बनी। भारत ने यह दिखाया था कि प्रभावी होने के लिए शक्ति-प्रयोग का अधिकतम-वादी होना आवश्यक नहीं है। ऐसे दौर में, जब देश अकसर लंबे चलने वाले संघर्षों में उलझ जाते हैं, भारत ने एक अलग मार्ग चुना। यह एक संयमित, सुनियोजित और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित मार्ग था। इसी ने उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को आकार दिया है।
दुनिया भर में हालिया संघर्षों ने एक कठोर सत्य उजागर किया है; आज युद्ध शुरू करना तो आसान है, लेकिन उन्हें समाप्त करना कहीं ज्यादा मुश्किल। निर्णायक जीत की अवधारणा लगातार दुर्लभ होती जा रही है। टेक्नोलॉजी ने अप्रत्याशित तरीकों से शक्ति-संतुलन को समतल कर दिया है। छोटे या अपेक्षाकृत कम विकसित देश भी अब बड़ी ताकतों को लंबे खिंचने वाले संघर्षों में फंसा सकते हैं, जो उनके संसाधनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों को क्षीण करते हैं। परिणामस्वरूप एक ऐसी रणनीतिक अस्पष्टता उभरती है, जिसमें लागत अत्यधिक होती है, उपलब्धियां सीमित रहती हैं और अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं होती।
ऐसे में भारत का दृष्टिकोण इस समझ को प्रतिबिम्बित करता है कि ताकत की आजमाइश का उद्देश्य केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय ढांचे के भीतर विशिष्ट और सीमित उद्देश्यों की प्राप्ति है। ऑपरेशन सिंदूर इसी तर्क का प्रतीक था। इसका उद्देश्य न तो किसी के भूगोल को बदलना था और न ही अधिकतम-वादी लक्ष्यों का पीछा करना; इसका उद्देश्य रणनीतिक स्थिरता को बनाए रखते हुए एक स्पष्ट और विश्वसनीय संदेश देना था। ऐसा करके भारत ने उस सिद्धांत को पुनर्स्थापित किया, जो समकालीन भू-राजनीति में लगातार दुर्लभ होता जा रहा है। और वह है : शक्ति का अनुशासित प्रयोग।
इस अनुशासन को अकसर सतर्कता से उपजे संयम के रूप में गलत समझ लिया जाता है। वास्तव में, यह आत्मविश्वास से उपजा संयम है। भारत के नेतृत्व ने यह प्रदर्शित किया कि उसके पास न केवल प्रहार करने की क्षमता और इच्छाशक्ति है, बल्कि उद्देश्यों की प्राप्ति के बाद रुक जाने का विवेक भी है। आक्रामकता और संयम के बीच यह संतुलन सहजता से प्राप्त नहीं होता। इसके लिए राजनीतिक उद्देश्य की स्पष्टता, पेशेवर सैन्य क्षमता और ऐसी संस्थागत संस्कृति की आवश्यकता होती है, जो परिणामों को महत्व देती हो।
साथ ही, भारत का दृष्टिकोण अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति अडिग प्रतिबद्धता पर आधारित है। जीवन की रक्षा और सुरक्षा का आश्वासन सर्वोपरि बने हुए हैं। इस आवश्यकता का पालन दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों से पृथक होकर नहीं किया जाता। बल्कि इसे एक व्यापक रणनीतिक दृष्टि में समाहित किया गया है। यह ऐसी दृष्टि है, जो स्वीकार करती है कि स्थायी सुरक्षा आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और वैश्विक विश्वसनीयता से अलग नहीं है।
इस दृष्टिकोण के कुछ और प्रमुख तत्व विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जैसे उद्देश्य की स्पष्टता, जिसमें शक्ति का प्रयोग परिभाषित और प्राप्त करने योग्य परिणामों के लिए किया जाता है- न कि अनिश्चित लक्ष्यों के लिए। नियंत्रित एस्केलेशन, जिसमें निर्णायक कार्रवाई की क्षमता होती है। साधनों का समन्वय, जिसके तहत राजनीतिक, सैन्य, कूटनीतिक और सूचनात्मक उपकरण परस्पर सामंजस्य में कार्य करते हैं। और दीर्घकालिक हितों की प्रधानता, जिसमें तात्कालिक प्रतिक्रियाएं राष्ट्रीय हित के अनुरूप होती हैं।
यह फ्रैमवर्क भारत की व्यापक आकांक्षाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र की परिकल्पना निरंतर आर्थिक गति की मांग करती है। व्यापक संघर्ष उन परिस्थितियों को बाधित कर देता है, जो विकास को संभव बनाती हैं : निवेशकों का विश्वास, बुनियादी ढांचे का विकास और सामाजिक एकता। इसलिए भारत का रणनीतिक संयम उसकी सीमा नहीं, बल्कि उसकी सावधानीपूर्वक चुनी गई प्राथमिकता है। यह इस समझ को भी दर्शाता है कि राष्ट्रीय शक्ति का मापदंड सैन्य क्षमता ही नहीं, आर्थिक सुदृढ़ता में भी निहित है।
- ऐसे दौर में, जब देश अकसर लंबे चलने वाले संघर्षों में उलझ जाते हैं, भारत ने एक अलग मार्ग चुना। यह एक संयमित, सुनियोजित और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित मार्ग था। इसने उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को आकार दिया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









