![]()
मौसम बदलने पर रात में कुछ लोगों की नींद 4-5 बार टूटती है। ठंडी हवा, कम धूप और छुट्टियों का तनाव भी नींद में बाधक है। इस वजह से सुबह उठने पर थकान और दिनभर सुस्ती महसूस होती है। डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक इसे ‘मौसमी अनिद्रा’ की मार बताते हैं। यानी मौसम बदलने से दिमाग पर उसका असर पड़ता है, जिससे मूड प्रभावित होता है। दुनिया में करोड़ों लोग इससे पीड़ित हैं। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया में मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. राज दासगुप्ता बताते हैं कि इंसोम्निया कोई बीमारी नहीं, बल्कि मौसमी पैटर्न है। मौसम बदलने से शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी पर असर पड़ता है। इसका असर अनिद्रा के रूप में सामने आता है। अमेरिका की नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, 7-9 घंटे की नींद जरूरी है, लेकिन मौसम बदलने पर खासतौर से सर्दियों में ये क्रम टूटता है। मनोवैज्ञानिक डॉ. निकोल मोशफेग का दावा है कि मूड या एनर्जी में बदलाव और कम धूप की वजह से अच्छी नींद नहीं आ पाती है। जबकि सुबह की धूप सेंकने से सेरोटोनिन हार्मोन बढ़ता है, जो मूड सुधारता है। बेहतर नींद में मदद करता है। दिन-रात का फर्क कम होने से भी नींद पर असर आमतौर पर ठंडे देशों में दिन-रात में लाइट में ज्यादा अंतर नहीं होता। ऐसे में दिमाग को भ्रम होता है। इससे नींद बार-बार खराब होती है। छुट्टियों का तनाव, परिवार का दबाव, खानपान की आदतों से भी नींद का क्रम बिगड़ता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के मुताबिक, स्क्रीन लाइट मेलाटोनिन दबाती है, जिसका नींद पर असर पड़ता है। लाइट थैरेपी, आसान समाधान डॉ. राज दासगुप्ता सलाह देते हैं कि सुबह धूप में घूमें, घर में हैं, तो प्रयास करें कि खिड़की के पास खुले में रहें। जरूरत पड़े तो लाइट थैरेपी भी ले सकते हैं। ये आसान तरीका है। इससे ‘सर्केडियन रिद्म’ रीसेट होती है। रात में नींद अच्छी आती है। रिसर्च: कम धूप से पसंदीदा चीजों में भी रुचि कम होती है
मौसमी अनिद्रा की कोई मेडिकल डायग्नोसिस नहीं है, इसलिए दुनिया में इसके बारे में कोई सीधा डेटा उपलब्ध नहीं है। लेकिन कुछ अध्ययन और सर्वे संकेत देते हैं कि सर्दियों में नींद की दिक्कतें लगभग हर जगह देखी जाती है। इसकी एक वजह कम धूप का होना है। अमेरिका की मनोवैज्ञानिक डॉ. जेड वू के अनुसार, कम धूप का असर मूड पर भी पड़ता है। यही वजह है कि सर्द मौसम में चिंता, उदासी और सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (एसएडी) जैसे लक्षण बढ़ जाते हैं। इसमें पहले पसंद आने वाली चीजों में भी रुचि कम हो जाती है।
Source link








