जीवन शैली/फैशन लाइफस्टाइल

हरिद्वार में सूखी गंगा में चांदी-सोना ढूंढ रहे लोग: बोले- हर साल गंगा बंदी का इंतजार करते हैं, पानी नहीं मिलने से श्रद्धालु हो रहे निराश – Haridwar News

Spread the love




धर्मनगरी हरिद्वार में इन दिनों गंगनहर की वार्षिक बंदी के चलते गंगा की धारा का प्रवाह थमा हुआ है। मां गंगा में स्नान करने की कामना लेकर हरिद्वार पहुंच रहे श्रद्धालुओं को घाटों पर पानी कम होने के कारण निराशा का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, गंगा की धारा थमने का असर स्थानीय व्यापार पर भी देखने को मिल रहा है। लेकिन इस बंदी के बीच कुछ ऐसे परिवार भी हैं, जिनके लिए सूखी गंगा किसी उम्मीद से कम नहीं है। ये लोग गंगा की तलहटी में उतरकर सिक्के, तांबे की वस्तुएं और कभी-कभार सोने-चांदी की छोटी चीजें तलाशते हैं। दिनभर की मेहनत के बाद मिलने वाली इन वस्तुओं से इनके घर का खर्च चलता है और त्योहारों के दिनों में परिवारों को आर्थिक सहारा मिलता है। गंगा बंदी के दौरान एक ओर जहां उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की ओर से घाटों की सफाई, मरम्मत और आवश्यक निर्माण कार्य कराए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर गंगा की तलहटी में लोगों की एक अलग ही दुनिया नजर आती है। सुबह होते ही कई लोग अपने परिवारों के साथ गंगा के सूखे हिस्सों में पहुंच जाते हैं। हाथों में छोटी छड़ियां, जालियां और दूसरे साधारण उपकरण लेकर वे मिट्टी और रेत में अपने लिए कमाई तलाशते हैं। किसी को कुछ सिक्के मिलते हैं, तो किसी के हाथ तांबे की वस्तुएं लगती हैं। कभी किसी को सोने या चांदी की छोटी वस्तु मिल जाने पर पूरे दिन की मेहनत सफल हो जाती है। पढ़िए घाटों से ग्राउंड रिपोर्ट… गंगा बंदी का इंतजार करते हैं ये लोग, सूखी तलहटी में तलाशते हैं कमाई गंगनहर की वार्षिक बंदी आमतौर पर हर साल अक्टूबर में की जाती है। इस दौरान गंगनहर में पानी की आपूर्ति रोककर सफाई और मरम्मत के काम किए जाते हैं। बंदी के बाद दीपावली के आसपास नहर में दोबारा पानी छोड़े जाने की व्यवस्था रहती है। इसी अवधि में गंगा के कुछ हिस्सों में पानी कम होने से तलहटी में जमा वस्तुओं को तलाशने का अवसर मिलता है। कई लोगों के लिए यह समय साल के दूसरे दिनों से अलग होता है। वे गंगा बंदी का इंतजार करते हैं, क्योंकि इस दौरान उन्हें अपनी रोजी-रोटी के लिए कुछ अतिरिक्त कमाई की उम्मीद रहती है। परिवार के सदस्य मिलकर गंगा की तलहटी में खोजबीन करते हैं। दिनभर की मेहनत के बाद जो भी सामान मिलता है, उसे उसकी धातु और उपयोगिता के अनुसार बेचने या दूसरे तरीके से इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, हर दिन की तलाश में कीमती वस्तुएं मिलना तय नहीं है। कई बार घंटों की मेहनत के बाद केवल कुछ सिक्के या मामूली धातु की वस्तुएं ही हाथ लगती हैं। इसके बावजूद लोग उम्मीद नहीं छोड़ते और अगले दिन फिर उसी लगन से गंगा में उतर जाते हैं। साधु राम बाबा को मिली सोने जैसी धातु, बेचने पर मिले करीब 300 रुपए हरिद्वार के साधु राम बाबा बताते हैं कि गंगा बंदी शुरू होने के दिन से ही उन्होंने गंगा की तलहटी में वस्तुएं तलाशना शुरू कर दिया था। इस दौरान उन्हें सिक्के मिलने के साथ-साथ सोने जैसी धातु से बनी एक छोटी वस्तु भी मिली। बाबा के मुताबिक, इस वस्तु को बेचने पर उन्हें करीब 300 रुपये मिले। साधु राम बाबा का कहना है कि गंगा में सामान तलाशने के लिए लगातार मेहनत और लगन की जरूरत होती है। प्रतिदिन तलाश करने पर कुछ न कुछ मिलने की उम्मीद बनी रहती है। बठिंडा से हर साल हरिद्वार आते हैं चना सिंह, बढ़ती भीड़ से मुश्किल हुई तलाश पंजाब के बठिंडा से हरिद्वार आने वाले चना सिंह भी गंगा बंदी के दौरान सामान तलाशने के लिए यहां पहुंचते हैं। उनका कहना है कि वह हर साल गंगा बंदी के समय हरिद्वार आते हैं और सुबह के समय अपनी तलाश शुरू कर देते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि दिनभर की मेहनत से कुछ न कुछ ऐसा मिल जाए, जिससे कमाई हो सके। चना सिंह के मुताबिक, गंगा की तलहटी में तलाश के दौरान कभी सोने के आभूषण जैसी वस्तुएं, कभी चांदी के सिक्के और कभी अष्टधातु या तांबे से बनी छोटी मूर्तियां मिलने की संभावना रहती है। हालांकि, ऐसी वस्तुएं हर किसी को नहीं मिलतीं और अधिकांश लोगों को सिक्कों या सामान्य धातु की वस्तुओं से ही संतोष करना पड़ता है। पंडा समाज के मुताबिक, श्रद्धालुओं की आस्था से मिलता है इन परिवारों को सहारा हरिद्वार के पंडित जयराम सिंह का कहना है कि गंगा बंदी के दौरान सामान तलाशने वाले कई लोग इस समय का बेसब्री से इंतजार करते हैं। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार गंगा में सिक्के, धातु की वस्तुएं और दूसरी चीजें प्रवाहित करते हैं। पानी कम होने पर इनमें से कुछ वस्तुएं गंगा की तलहटी में दिखाई देने लगती हैं, जिन्हें तलाशकर लोग अपनी आजीविका चलाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने बताया कि इन लोगों के लिए गंगा बंदी के दिन कमाई जुटाने का एक महत्वपूर्ण अवसर होते हैं। कई परिवार सुबह ही गंगा के सूखे हिस्सों में पहुंच जाते हैं और शाम तक तलाश में जुटे रहते हैं। इस काम में केवल बड़े ही नहीं, बल्कि परिवार के दूसरे सदस्य भी साथ देते हैं। पहले बड़ी मूर्तियां भी मिलने की चर्चा, अब कम हो गई हैं कीमती वस्तुएं पंडित शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि पहले की तुलना में अब गंगा की तलहटी में कीमती वस्तुएं कम मिलने की बात सामने आती है। उनके अनुसार, पहले श्रद्धालु गंगा में अधिक संख्या में विभिन्न प्रकार की वस्तुएं प्रवाहित करते थे। उस समय कभी-कभी बड़ी मूर्तियां और दूसरी धातु की वस्तुएं भी लोगों को मिल जाती थीं। हालांकि, अब सामान तलाशने वाले लोगों को अधिकतर सिक्के, तांबे की वस्तुएं और छोटी-मोटी चीजें ही मिल पाती हैं। सोने-चांदी की वस्तुएं मिलने की संभावना बनी रहती है, लेकिन ऐसी वस्तुएं बहुत कम लोगों के हाथ लगती हैं। इससे इस काम से होने वाली कमाई भी अनिश्चित बनी रहती है। उनका कहना है कि गंगा बंदी के दौरान सामान तलाशने वाले लोगों की मेहनत और उम्मीद दोनों बनी रहती हैं, लेकिन पहले की तरह कीमती वस्तुएं मिलने की संभावना अब कम दिखाई देती है। एक तरफ घाटों की सफाई, दूसरी तरफ परिवारों की रोजी-रोटी गंगा बंदी का मुख्य उद्देश्य गंगनहर की वार्षिक सफाई, मरम्मत और आवश्यक निर्माण कार्यों को पूरा करना है। इस अवधि में संबंधित विभाग की ओर से घाटों और नहर से जुड़े हिस्सों में जरूरी कार्य किए जाते हैं, ताकि पानी की आपूर्ति दोबारा शुरू होने पर व्यवस्था सुचारू बनी रहे। इसी दौरान गंगा के कुछ हिस्सों में पानी कम होने से तलहटी में जमा कचरा और दूसरे पदार्थ भी दिखाई देने लगते हैं। जहां एक ओर यह स्थिति सफाई की जरूरत को उजागर करती है, वहीं दूसरी ओर सामान तलाशने वाले लोगों को भी वहां पहुंचने का अवसर मिलता है। हालांकि, तलहटी में मिलने वाली हर वस्तु कीमती नहीं होती और कई बार लोगों को लंबे समय तक मेहनत करने के बाद भी बहुत कम सामान मिल पाता है। इस तरह गंगा बंदी का यह समय अलग-अलग लोगों के लिए अलग मायने रखता है। श्रद्धालुओं के लिए यह स्नान की सुविधा प्रभावित होने का दौर है, व्यापारियों के लिए कारोबार में कमी की चुनौती है और कुछ परिवारों के लिए अतिरिक्त कमाई की उम्मीद। उम्मीद के सहारे गुजरते हैं गंगा बंदी के दिन हरिद्वार में गंगा केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि हजारों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी हुई है। घाटों पर पूजा-पाठ, धार्मिक गतिविधियों और यात्रियों की आवाजाही से अनेक परिवारों का जीवन चलता है। वहीं, गंगा बंदी के दौरान सामान तलाशने वाले लोगों के लिए सूखी तलहटी कमाई का एक वैकल्पिक जरिया बन जाती है। इन लोगों के लिए यह काम निश्चित आय का साधन नहीं है। कभी कुछ सिक्के मिल जाते हैं, कभी तांबे की वस्तु और कभी किसी को कोई कीमती चीज मिलने की उम्मीद पूरी हो जाती है। इसी अनिश्चितता के बीच वे हर दिन मेहनत करते हैं और जो कुछ मिलता है, उससे अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने का प्रयास करते हैं। गंगा बंदी के दौरान सूखी तलहटी में सामान तलाशते ये लोग बताते हैं कि उनके लिए हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता है। गंगा की धारा भले ही कुछ समय के लिए थम जाए, लेकिन इन परिवारों की मेहनत नहीं थमती। उनके लिए गंगा बंदी का हर दिन इस आस के साथ शुरू होता है कि शायद आज की तलाश घर के खर्च में मददगार साबित हो और आने वाले त्योहारों की खुशियों में कुछ योगदान दे सके।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *