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- Harivansh’s Column Who Has Been Able To Know And Understand The Secrets Of The Unknown Facts Of Life?
4 घंटे पहले
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हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति
इस ज्ञानसदी के वैज्ञानिक हैं डॉ. विली सून (हार्वर्ड विश्वविद्यालय)। खगोल भौतिकशास्त्री, एयरोस्पेस इंजीनियर। उनका निष्कर्ष है- ईश्वर है! आधुनिक युग यूरोपीय पुनर्जागरण की कोख से जन्मा। उस कालखंड (14वीं-17वीं सदी) की बौद्धिक सम्पदा, ज्ञान, विवेक, वैज्ञानिक सोच-खोज व चिंतन-मंथन से। उसी पुनर्जागरण दौर के उत्तरार्द्ध में हुए जर्मन दार्शनिक नीत्शे एक कथन से अमर हुए- ईश्वर मर चुका है!
हालांकि पुनर्जागरण काल के एक अन्य महानायक कोपरनिकस बता गए थे कि धरती ईश्वर का चरणपीठ है। ब्रह्मांड में मामूली राई जैसा। पर एआई के दौर में डॉ. सून अपनी मान्यता पर दृढ़ हैं कि गणितीय फार्मूले से ईश्वर का अस्तित्व साबित हो सकता है।
सबूत के लिए डॉ. सून, पॉल डिराक का उल्लेख करते हैं। डिराक कैम्ब्रिज के गणितज्ञ थे। गणित सृष्टि-प्रकृति के संचालन नियमों को समझने की भी प्रामाणिक विधा है। अमरीका के ही शिखर गणितज्ञ डेल मकिन्ययर ने इतिहास के प्रभावी 21 गणितज्ञों की ईश्वर-आस्था पर पेपर लिखा है। भारत के ऋषि गणितज्ञ हुए- वराहमिहिर, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त वगैरह। इन्होंने भी गणित को ब्रह्मांड-नियमों की व्याख्या का साधन माना। श्रीनिवास रामानुजन ने तो गणित में ही ईश्वर को देखा।
मानव अस्तित्व के साथ ही यह जिज्ञासा जन्मी कि सृष्टि स्वयंभू है या इसका कोई सूत्रधार है? आरंभ में धर्माचार्यों, धर्मों ने विचारा। गणितज्ञ आए। फिर खगोलशास्त्री, जीव विज्ञानी, विकासवादी वगैरह। परमाणु भौतिकी, क्वांटम भौतिकी के दौर में भौतिकशास्त्री अमित गोस्वामी की किताब आई- गॉड इज नॉट डेड (ईश्वर मरा नहीं है)। किताब की शुरुआत ही वे एक सवाल से करते हैं।
क्या ईश्वर के अस्तित्व का सवाल वैज्ञानिक प्रमाणों से हल हो सकता है? फिर कहते हैं, यह मुमकिन है। ईश्वर के होने के पक्ष में है। सृष्टि के अगम-अगोचर, अबूझ रहस्य, बुद्धिवादियों को स्तब्ध करते हैं। सामान्यजन को भी।
भारतीय संतों, साधकों या आध्यात्मिक ऋषियों के दुर्लभ अनुभव हैं। पश्चिम के तार्किक बुद्धिवादी जीवन-रहस्य ढूंढने निकले, उनके भी स्व-अनुभव हैं कि जो दिखता है, वही जगत नहीं है। पॉल ब्रंटन ऐसे ही तार्किक ब्रिटेनवासी थे।
जीवन समझने के क्रम में रूस-इजिप्ट वगैरह की यात्राएं की। समृद्ध अनुभव लिखे। भारत पर उनकी दो किताबें सर्च इन सीक्रेट इंडिया (1934), अ हरमिट इन द हिमालयाज (1936) सृष्टि की व्यापकता की गहरी झलक देती हैं।
दार्शनिकों की धरती जर्मनी में हुए अर्न्स्ट हॉफमैन। तिब्बत, बर्मा-चीन वगैरह की यात्राएं कीं। अनुभवों से हतप्रभ हुए। श्रेष्ठ बौद्ध लामा बने- अंगरिका गोविंद। विश्व चर्चित किताब है- द वे ऑफ द ह्वाइट क्लाउड्स। वे बर्मा की तत्कालीन ग्रीष्म राजधानी (मेमाओ) में थे। एक छोटे बच्चे मायुंग से मिले।
वह आचार्यों की एक बड़ी सभा को सम्बोधित कर रहा था। बमुश्किल छह वर्ष का। गरीब घर में जन्मा। अपने पूर्व जन्म के बड़े बौद्धमठ को पहचाना। अपनी चीजों के साथ बौद्ध आचार्यों को पहचाना। गोपनीय तथ्य बताए। बर्मा के गवर्नर सर हेनरी बटलर समेत पूरा बर्मा उस बच्चे की विलक्षण प्रतिभा, विद्वत्ता, प्रवचन और आचार-विचार से हतप्रभ थे।
फिर अंगरिका खुद से सवाल करते हैं। मोत्सार्ट-बीथोवेन जैसे संगीतकार कम उम्र में विलक्षण कैसे हुए? मोत्सार्ट ने 7 वर्ष की उम्र में श्रेष्ठ संगीत कम्पोज किया। ऑस्ट्रिया सम्राज्ञी मारिया के दरबार में अविस्मरणीय संगीत सुनाया।
बीथोवेन ने 8 वर्ष की आयु में कॉन्सर्ट दिया। इस तरह अनेक विलक्षण व ऐतिहासिक (साहित्य, गणित वगैरह क्षेत्रों से) घटनाओं को अंगरिका ने दर्ज किया है। पूछते हैं ऐसे तथ्यों के रहस्य कौन समझ-जान सका है?
भारतीय मानस में धारणा है कि सृष्टि अगम-अगोचर है। दुनिया की विशिष्ट संस्था है जेनेवा स्थित न्यूक्लियर रिसर्च केंद्र, सर्न। इसका मकसद है प्रकृति की बुनियादी ऊर्जा, ब्लैकहोल, डार्क मैटर की प्रकृति और भौतिकी कणों के गुणों को समझना-पहचानना। 13.8 अरब वर्ष पुराने ब्रह्मांड में धरती की स्थिति, उस केंद्र को देखने से एहसास होता है कि- राई जैसी ही है! (ये लेखक के अपने विचार हैं)








