होलिका दहन 13 मार्च को:  होलिका-प्रहलाद, बसंत की शुरुआत, नई फसल से जुड़ी हैं होली की कथाएं, कामदेव ने प्रकट की थी बसंत ऋतु
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होलिका दहन 13 मार्च को: होलिका-प्रहलाद, बसंत की शुरुआत, नई फसल से जुड़ी हैं होली की कथाएं, कामदेव ने प्रकट की थी बसंत ऋतु

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4 घंटे पहले

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कुछ ही दिनों के बाद 13 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा यानी होलिका दहन है। इसके बाद 14 मार्च को होली खेली जाएगी। इस पर्व की मान्यताएं होलिका-प्रहलाद के साथ ही बसंत ऋतु और नई फसल से भी जुड़ी हैं।

रंगों का ये पर्व उत्साह और आनंद का प्रतीक है। इस समय पेड़ों से पत्ते गिरने लगते हैं और नए पत्ते आने लगते हैं। प्रकृति हमें बताती है कि जब पुरानी चीजें खत्म होती हैं, तब ही नई शुरुआत होती है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा कहते हैं कि ज्योतिष में होली की रात का महत्व काफी अधिक रहता है। होलिका दहन की रात तंत्र-मंत्र से जुड़ी साधनाएं की जाती हैं। जो लोग मंत्र साधना करना चाहते हैं, वे किसी विशेषज्ञ गुरु के मार्गदर्शन में मंत्र जप और साधना करते हैं।

भक्त प्रहलाद और होलिका से जुड़ी मान्यता

प्रहलाद और होलिका की मान्यता सबसे ज्यादा प्रचलित है। प्रहलाद हिरण्यकश्यपु का पुत्र था, वह विष्णु भक्त था। इस बात से हिरण्यकश्यपु बहुत क्रोधित था और प्रहलाद को मार देना चाहता था। उसकी कई कोशिशों के बाद भी हर बार विष्णु कृपा से प्रहलाद बच जाता था। तब हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को आग में न जलना का वरदान मिला हुआ था, लेकिन विष्णु कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई। ये घटना फाल्गुन पूर्णिमा की मानी जाती है। तब से होलिका दहन का त्योहार मनाया जाने लगा।

कामदेव ने प्रकट की बसंत ऋतु

होली के समय से बंसत ऋतु की शुरू होती है। एक मान्यता ये भी है कि बसंत ऋतु के स्वागत में रंगों का त्योहार मनाया जाता है। कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए बसंत ऋतु को प्रकट किया था। बसंत को ऋतुरात कहा जाता है। इसके बाद जब शिव जी का तप भंग हुआ तो उन्होंने कामदेव भस्म कर दिया था। बाद में कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर शिव जी उसे ये वरदान दिया था कि द्वापर युग में कामदेव श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। ये घटना फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की ही घटना मानी गई है।

किसानों के लिए महापर्व है होली

ये फसल पकने का समय है। इन दिनों में अधिकतर किसानों की फसलें तैयार हो जाती हैं, किसान फसल पकने की खुशी मनाने के लिए रंगों से त्योहार मनाते हैं, इस मान्यता की वजह से भी होली मनाने का चलन है। किसान जलती हुई होली में नई फसल का कुछ भाग अपने इष्टदेव को अर्पित करते हैं और खुशियां मनाते हैं।

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