Duniya Mere Aage Common people talk to fellow passengers while travelling in bus and train
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Duniya Mere Aage Common people talk to fellow passengers while travelling in bus and train

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हम दिनभर में अपने घर के लोगों से तो आमतौर पर बातें करते ही रहते हैं, लेकिन न जाने कितने परिचित और अनजान लोगों से भी मिलते हैं और कम से कम जरूरत भर बात करते हैं। मसलन, दुकानदारों से सौदा-सुलुफ लेते हुए, बस-ट्रेन या तिपहिया से दफ्तर जाते हुए और दफ्तर में सहयोगियों और आगंतुकों से भी किसी काम या जरूरत के लिए या फिर यों ही बात करना। यह बातचीत या संवाद जरूरी भी है, न सिर्फ कामकाज की सहजता के लिए, बल्कि जीने के लिए और अपना मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रखने की खातिर भी, क्योंकि जिस प्रकार शरीर के लिए कुछ व्यायाम और संतुलित आहार आवश्यक है, उसी प्रकार मन के लिए या कहें कि दिल-दिमाग के लिए संवाद, पठन-पाठन और हल्का-फुल्का मनोरंजन जरूरी होता है।

अपने आसपास की आबोहवा में हम सब महसूस करते होंगे कि कई बार लोगों की उपस्थिति तो होती है, मगर एक तरह की संवादशून्यता छाई रहती है। एक प्रसंग पर गौर किया जा सकता है, लेकिन इसे प्रतिनिधि उदाहरण भी माना जा सकता है। एक ट्रेन की प्रथम श्रेणी में कुछ लोग बैठे हुए थे, मगर सभी चुप थे। आज जैसा दौर है, उसमें जाहिर है कि सभी अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त थे।

काफी देर की चुप्पी के बाद अचानक एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से थोड़ा ऊंचे स्वर में वहां मौजूद अन्य लोगों को सुनाते हुए पूछा कि आप कहां जाएंगे। दूसरे का जवाब था- ‘दिल्ली।’ पहले ने कहा कि वह भी दिल्ली जा रहा है। यही नहीं, वे दोनों एक ही अपार्टमेंट में और एक ही फ्लैट में रहते थे। एक ही फ्लैट की बात सुन कर जब सहयात्रियों से नहीं रहा गया, तो उनमें से एक ने कहा कि कमाल है कि आप दोनों एक ही फ्लैट में रहते हैं और एक दूसरे को नहीं जानते, ये कैसे संभव है। अब वे दोनों बोले कि हम बाप-बेटा हैं और आप सभी अपने में गुम अपना-अपना चेहरा बना के बैठे हैं। इसलिए हमने सोचा कि हम ही आपस में बात कर के समय काट लें।

एक उम्र के बाद अकेलापन महसूस करने लगते हैं वृद्ध मां-बाप

अगर महज उदाहरण के लिए प्रस्तुत किए गए इस हंसी-मजाक को छोड़ दिया जाए और देखा जाए कि विदेश में, जहां संयुक्त परिवारों का चलन लगभग खत्म हो गया है, ऐसी खबरें भी आती रहती हैं कि कई जगहों पर एक-दूसरे की निजता का अत्यंत ध्यान रखा जाता है। वहां अपने माता-पिता से मिलने जाते हुए भी कहीं और रहने वाले बेटा या बेटी पहले माता-पिता से फोन पर समय लेते हैं और तय समय पर पहुंचते हैं।

यहां तक भी ठीक मान लिया जा सकता है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब एक उम्र के बाद वृद्ध मां-बाप अकेलापन महसूस करने लगते हैं या एक ही इमारत के पास के अपार्टमेंट में रहने वाले जवान-जहान लोग भी एक दूसरे को नहीं जानते। जिन देशों में हर चीज आनलाइन मंगवाई जा सकती है या मंगवाई जाती है, सभी प्रकार के बिलों, यथा बिजली-पानी आदि का भुगतान आनलाइन ही किया जाता है, वहां एक प्रकार की संवादहीनता अनुभव की जाती है। इसी वजह से लोग मनोविकारों से पीड़ित हो जाते हैं और आखिरकार उन्हें मनोचिकित्सकों की आवश्यकता पड़ती है।

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दरअसल, हर चीज घर बैठे मिल जाती है और जो लोग ये सामान घरों मे देने आते हैं, वे भी जल्दी में रहते हैं। इसलिए बातचीत आखिर की जाए, तो किससे? वर्षों पहले स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ते हुए लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेशोत्सव की नींव रखी और जल्द ही देशभर में गणेश उत्सव उत्साह से मनाया जाने लगा। आज इसका चाहे जो स्वरूप हो गया हो, लेकिन इसके पीछे लोकमान्य तिलक का एक विचार था कि इस उत्सव के बहाने से लोग साथ आएंगे और उनमें संवाद स्थापित होगा। फिर लोगों के मन में स्वतंत्र देश के लिए भावनाएं जगाई जा सकेंगी।

आपसी संवाद सचमुच होता है अत्यंत आवश्यक

हमारे देश में बढ़ती जनसंख्या एक समस्या हो सकती है, मगर इसका एक सच यह भी है कि इसी के चलते हम लोग संवादहीनता से बचे हुए हैं। हालांकि अब हम लोग भी आनलाइन सामान मंगवाने लगे हैं, मगर हमारे संस्कार हमें इन सामान को पहुंचाने आए लोगों से भी बातचीत और गर्मी के दिनों में पीने का पानी देने के लिए प्रेरित करते हैं। अड़ोस-पड़ोस के लोगों से पहचान और बातचीत भी हमें अनेक समस्याओं से बचाती हैं, क्योंकि ये रोजमर्रा की बातचीत और पहचान ही आड़े वक्त मदद का हाथ बन कर सामने आती है। हमारे देश में आम लोग तो बस-ट्रेन में सफर करते वक्त सहयात्रियों से बातचीत करते हैं और पहचान बढ़ने के बाद अखबार-पत्रिकाओं और खाने-पीने की चीजों का भी आदान-प्रदान होने लगता है। इस तरह सफर आराम से कट जाता है।

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बातचीत से अनेक समस्याएं सुलझ सकती हैं। आपसी सहयोग बढ़ सकता है, गलतफहमियां दूर हो सकती हैं। इस संदर्भ में एक मजेदार शेर मौजू है कि ‘राह पर उनको लगा लाए तो हैं बातों में और खुल जाएंगे दो चार मुलाकातों में।’ इसलिए आपसी संवाद सचमुच अत्यंत आवश्यक है। समाज को सीख देने वाले ने कहीं कहा था कि अपने आसपास के लोगों के साथ जैसे रहो, लेकिन साथ रहने के लिए सब कुछ करो। कभी वक्त आए तो उससे छोटे-मोटे झगड़े कर लेना, लेकिन जल्दी ठंडा होकर बातचीत फिर शुरू कर देना, क्योंकि बातचीत बंद करने से सुलह का रास्ता बंद हो जाता है।





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