‘I was caught up in the thought of what people would say’ | ‘लोग क्या कहेंगे के चक्कर में फंसी रही’: महिमा चौधरी बोलीं-  ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ में सामाजिक दबाव वर्सेस  मर्यादा-नैतिकता की जंग दिखेगी
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‘I was caught up in the thought of what people would say’ | ‘लोग क्या कहेंगे के चक्कर में फंसी रही’: महिमा चौधरी बोलीं-  ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ में सामाजिक दबाव वर्सेस  मर्यादा-नैतिकता की जंग दिखेगी

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36 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी

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एक्ट्रेस महिमा चौधरी की फिल्म ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ सेकंड चांस की थीम पर आधारित है। इस फिल्म में समाज का दबाव और मर्यादा-नैतिकता के बीच की जंग दिखाई गई है। हाल ही में दैनिक भास्कर से खास बातचीत के दौरान एक्ट्रेस ने बताया कि लोग क्या कहेंगे वाली सोच आज भी हमें कई चीजें करने से रोक देती है। ऐसी मुश्किल व्यक्त में सच्चाई का सामना कैसे करें, यह बात फिल्म में दिखाई गई है। पेश है महिमा चौधरी से हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंश..

सवाल: जब फिल्म ‘दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी’ का पोस्टर आया तो लोगों को लगा कि आपने सच में संजय मिश्रा से शादी कर ली। आप क्या कहना चाहेंगी?

जवाब: मुझे ढेर सारे मैसेज आए। मुझे लगता है लोगों को पता ही नहीं था कि फिल्म बन रही है। किसी को खबर ही नहीं थी। तो जब उन्होंने वो फोटो देखी, तो सोचा ये कोई न्यूज है, प्रमोशन नहीं।

सवाल: फोटो शूट के समय आप जिस अंदाज में पैपराजी से बात रह रही थी और लोग मिठाई खाकर जा रहे थे, उस समय सिचुएशन तो बहुत कमाल की थी। क्या कहना चाहेंगी?

जवाब: असल में वो बहुत नॉर्मल बात थी। हम फोटोशूट कर रहे थे, तभी उन्होंने कहा, “दो मिनट के लिए बाहर आ जाइए, धूप में फोटो खिंचवा लो।” मैं तो चेंज करने वाली थी अगले पोस्टर के लिए, जो दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे वाला गेटअप था। लेकिन उन्होंने कहा, “नहीं मैम, लाइट चली जाएगी, ऐसे ही आ जाइए।” हम सोच रहे थे ऐसा कैसे, प्रकाश में जाकर शादी हो गई क्या? नेक्स्ट डे सब कांग्रेचुलेशंस भेज रहे थे, जैसे क्या बधाई दे रहे हो? वो तो बस हो गया।

सवाल: इस फिल्म की शूटिंग ज्यादातर बनारस में हुई है, क्या की क्या चीजें आपको खास लगीं?

जवाब: मुझे ब्लू लस्सी का वो स्टॉल याद है, और हमारा फेवरेट डोसा वाला, जो दशाश्वमेध घाट से पहले वाले इलाके में है। हम लोग तो होटल में ही रुके थे, लेकिन संजय जी ने बिल्कुल घाट के किनारे पर ही एक कमरा लिया था। वे वहीं पर खुद खाना बनाते थे और पानी के बिल्कुल पास रहते थे, क्योंकि उन्हें ऐसे ही रहना अच्छा लगता है।

सवाल: फिल्म में सेकंड चांस की थीम पर समाज का दबाव और आपकी मर्यादा-नैतिकता के बीच की जंग दिखाई गई है। इस किरदार को निभाते हुए आपने इसे अपनी रियल लाइफ से कैसे कनेक्ट किया?

जवाब: सोशल मीडिया पर सब यही कह रहे हैं कि जो भी करो, खुश रहो। अगर दूसरी इनिंग्स मिले या कोई चीज न चले, तो कोशिश मत छोड़ो। फिर से ट्राई करो, उम्मीद बनाए रखो। उम्मीद ही जिंदगी का सबसे बड़ा ड्राइवर है। जिस दिन उम्मीद खो दी, तो सब खत्म।

बचपन में एक कहानी सुनी थी न? एक लड़की बीमार है, वो कहती है कि जब आखिरी पत्ता गिर जाएगा, तब मर जाऊंगी। सर्दी आ जाती है, लेकिन एक पत्ता नहीं गिरता। वो उसी उम्मीद से जी जाती है। वो पत्ता पेंटर ने दीवार पर बना कर लटकाया था। जिंदगी भी वैसी ही है। हमेशा उम्मीद रखनी चाहिए।

ये उम्मीद आस्था से मिलती है। इसलिए बुजुर्ग कहते हैं, घर से निकलने से पहले भगवान के सामने हाथ जोड़ लो। मैं आजकल यही करती हूं। हर काम से पहले कहती हूं, “भगवान, आप संभाल लेना।” सबकी जिंदगी में ये उम्मीद का जज्बा होना चाहिए।

सवाल: अक्सर हम सोचते रहते हैं कि लोग क्या कहेंगे। क्या आपके साथ भी ऐसा कभी हुआ? आपने उससे कैसे पार पाया?

जवाब: मैं रोज ये चीज झेलती हूं। मैं कोशिश करती हूं कि मैं ये मानूं कि हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि लोग क्या कहेंगे, लेकिन सच ये है कि हमारे अंदर ये बात बैठी हुई है। फिर भी हम कई बार सोचते नहीं, बस कहते हैं, रहने दो, ऐसे ही ये मसला सॉल्व कर लेते हैं, नहीं तो लोग बेवजह बातें करेंगे, गलत सोचेंगे। यही वाली सोच आज भी हमें कई चीजें करने से रोक देती है।

जैसे कि इस फिल्म के डायरेक्टर सिद्धांत ने मुझे एक अनजान नंबर से मैसेज किया कि “दुर्लभ प्रसाद की दूसरी शादी” नाम की फिल्म बना रहे हैं। टाइटल ही मुझे बहुत इंटरेस्टिंग लगा। जब उन्होंने पूरी कहानी सुनाई, तो मैंने पूछा कि दुर्लभ प्रसाद कौन है? तो बोले-संजय मिश्रा जी। फिर उन्होंने मेरा इंट्रो बताया कि आपका इंट्रोडक्शन ऐसा होगा कि आप सिगरेट पी रही हो और शराब की बोतल खरीद रही हो।

वहीं पर मेरे दिमाग में फिर से “लोग क्या कहेंगे” वाला सवाल आ गया। मैं अभी-अभी अपने ट्रीटमेंट से निकली हूं, मैं अब एक बच्चे की मां हूं। हम एक्टर्स अपने आपको बहुत सीरियसली लेने लगते हैं कि नहीं, मुझे अपनी ऐसी इमेज नहीं बनानी कि लोग सोचें मैं इन चीजों को बढ़ावा दे रही हूं। मुझे ऐसी टॉक्सिक (नुकसानदायक) आदतों को ग्लैमराइज नहीं करना था।

तो मैंने उनसे पूछा कि क्या कोई और तरीका हो सकता है मेरा इंट्रो दिखाने का? तो उन्होंने कहा- नहीं मैम, मजा ही इसमें है, कि वो लोग आपके जैसे कैरेक्टर के लिए बहुत सुशील, सीधी-सादी लड़की ढूंढ रहे हैं। लोग क्या कहेंगे” के चक्कर में मैं बहुत दिनों तक फंसी रही, फैसला नहीं कर पा रही थी।

फिर मैंने सिद्धांत से रिक्वेस्ट की कि देखिए, जो भी स्मोकर होता है, वो हमेशा यही बोलता है कि बस अब छोड़ रहा हूं, बस ये काम निपट जाए, बस ये टेंशन खत्म हो जाए। न्यू ईयर के बाद, हर किसी की यही कहानी होती है। तो मैंने कहा कि ऐसे दिखाना कि मेरा कैरेक्टर भी सिगरेट छोड़ने की कोशिश कर रहा है और पिक्चर के एंड तक वो छोड़ भी दे, ताकि लोग मुझे देखकर मोटिवेट हों और मेरी भी ये आदत छूट जाए। तो हमने वही फिल्म में रखा।



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