आलू अब सिर्फ पेट भरने वाली फसल नहीं, बल्कि विज्ञान और शोध की नई प्रयोगशाला भी बन चुका है। बदलती खानपान की जरूरतों और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच वैज्ञानिक ऐसी किस्में विकसित कर रहे हैं, जो बेहतर पोषण के साथ प्रोसेसिंग उद्योग की जरूरतों को भी पूरा कर सकें। इसी कड़ी में सीपीआरआई शिमला और देहरादून में विकसित कुफरी नीलकंठ, कुफरी सूर्या और चिप्सोना-1 जैसी किस्में उत्तर प्रदेश की आलू बेल्ट में तेजी से अपना दायरा बढ़ा रही हैं।
अकेले अलीगढ़ जिले में ही आलू के कुल रकबा 31.5 हजार में से दो हजार में नई किस्मों की पैदावार हुई है। इसी तरह, आगरा, हाथरस, मेरठ, सहारनपुर, कन्नौज, फिरोजाबाद, एटा और मैनपुरी जिले में भी इनका रकबा बढ़ा है। एक हेक्टेयर में 250 से 300 क्विंटल तक आलू निकला है। इसके बीज का भाव 2040 से 2905 रुपये प्रति क्विंटल तक है। यह भाव कंद के आकार पर भी निर्भर करता है। भाव अच्छा होने के कारण किसान बीज भी पैदा कर रहे हैं।
दरअसल संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, आलू दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। वैश्विक खाद्य सुरक्षा, पोषण और गरीबी उन्मूलन में आलू की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करने के लिए हर साल 30 मई को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय आलू दिवस मनाया जाता है। लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) सहित कई प्रयोगशालाओं में आलू की इन नई किस्मों पर परीक्षण हुए हैं जिनके मुताबिक सामान्य आलू की तुलना में नई किस्मों में कम शर्करा और बेहतर गुणवत्ता है। शायद यह भी एक वजह है कि चिप्स और प्रोसेसिंग उद्योग इन्हें हाथोंहाथ ले रहे हैं।








