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आजकल लोगों के पास कपड़ों से लेकर खानपान तक में चुनने की भरपूर आजादी है। यानी विकल्पों की भरमार है। इसे बेहतर जीवन के लिए अच्छा माना जाता रहा है, लेकिन मनोवैज्ञानिकों ने हालिया अध्ययनों में पाया है कि जीवन में चुनने की यह आजादी यानी अधिक विकल्प होने से मानसिक शांति छिन रही है। पेंसिल्वेनिया के स्वार्थमोर कॉलेज के मनोविज्ञान के मानद प्रोफेसर बैरी श्वार्ट्ज कहते हैं कि बहुत अधिक विकल्प चिंता, निर्णय लेने में देरी और फैसले से असंतोष बढ़ा सकते हैं। उदाहरण के लिए जब हमारे पास तमाम कपड़ों को चुनने का विकल्प होता है, तो यह सोचते हैं कि आज क्या पहनें या फिर आज नाश्ते में क्या खाएं या ऑनलाइन कौन-सा मोबाइल खरीदें? रात को कौन-सी वेब सीरीज देखें? मनोविज्ञान पर ‘द पैराडॉक्स ऑफ चॉइस’ किताब लिखने वाले प्रो. श्वार्ट्ज कहते हैं कि जब विकल्प बहुत ज्यादा होते हैं, तो व्यक्ति यह सोचकर परेशान रहता है कि गलत विकल्प न चुन ले। इस सिद्धांत को कई शाेधों ने भी पुष्ट किया है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रो. शीना अयंगर और मार्क लेपर के प्रसिद्ध ‘जैम स्टडी’ (2000) में पाया गया कि जब ग्राहकों को 24 तरह के जैम दिखाए गए तो खरीदारी कम हुई, जबकि केवल 6 विकल्प होने पर जैम की खरीदारी अधिक हुई। यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के मनोवैज्ञानिक प्रो. डैनियल विलिंघम कहते हैं कि हर नया फैसला अतिरिक्त मानसिक ऊर्जा मांगता है। इसलिए दिमाग पहले पुराने अनुभवों और आदतों का सहारा लेता है। यही वजह है कि लोग पसंदीदा चीजें बार-बार चुनते हैं। नोबेल विजेता हर्बर्ट साइमन ने ‘सैटिसफाइसिंग’ सिद्धांत में बताया है कि हर बार ‘सबसे बेहतरीन’ नहीं, बल्कि ‘अच्छा’ विकल्प चुनकर आगे बढ़ जाना ही जीवन को सुखद बनाता है। रोजमर्रा के छोटे फैसलों की संख्या कम करें। ‘परफेक्ट’ नहीं, ‘पर्याप्त अच्छा’ विकल्प चुनें। बड़े वित्तीय या तकनीकी फैसलों में विशेषज्ञ की सलाह लें। हर विकल्प की तुलना करने के बजाय पहले अपनी जरूरत तय करें। चुनने के ज्यादा विकल्प होने से गलत चुनाव का डर सताता है प्रो. डैनियल विलिंघम कहते हैं कि ज्यादा विकल्प होने से फैसला लेने में अधिक समय लगता है। गलत चुनाव का डर बढ़ता है। चुने गए विकल्प से भी संतुष्टि कम होती है। बाद में यह डर भी सताता है कि कहीं सबसे बेहतर छूट ताे नहीं गया। इससे मानसिक थकान बढ़ती है। प्रो. बैरी श्वार्ट्ज अपने शोध में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जरूरत से ज्यादा विकल्प निर्णय लेने की क्षमता और संतुष्टि दोनों घटा सकते हैं। वे कहते हैं कि जिंदगी की गुणवत्ता हमेशा ज्यादा विकल्पों से नहीं बढ़ती; कई बार कम विकल्प ही दिमाग को ज्यादा सुकून और फैसलों में ज्यादा भरोसा देते हैं।
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