गुणवंत शाह1 घंटे पहले
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बंद मुट्ठी में फिसलती रेत की तरह जीवन के सुनहरे वर्ष फिसलते चले जाते हैं। हर पेड़ के पत्तों के बीच हवा घूमती रहती है। हिलते हुए पत्ते डोलते रहते हैं, पर हवा कभी किसी पत्ते पर अपना बसेरा नहीं करती। वह कहीं भी ठहरना नहीं चाहती। प्रकृति का प्रेम करने का तरीका कुछ अनोखा है। सच्चे अर्थों में यह प्रेम गतिशील दिखाई देता है। सूरज की किरणें बंद खिड़कियों की दरार से कमरे में प्रवेश कर जाती हैं। इसमें स्वाभिमान का कोई प्रश्न ही खड़ा नहीं होता। कुछ देर बाद वे किरणें कमरे को छोड़कर कहीं और चली जाती हैं। बिना आसक्ति के प्रवेश और बिना खलल के विदाई।
यदि नदी को किनारों से प्रेम हो जाए तो वह बहना ही बंद कर देगी। आज तक किसी ने नहीं सुना कि आम के पेड़ के मोह में बंधकर कोई कोयल रो पड़ी हो। आज तक यह भी नहीं सुना होगा कि इंद्रधनुष ने आकाश में यह कहकर स्थायी ठिकाना बना लिया हो कि ‘अब यही मेरी मंजिल है।’ यह भी नहीं सुना होगा कि समुद्र की रेत ने किसी पदचिह्न को अपनी छाती से चिपकाकर रख लिया हो। कभी किसी ने यह भी नहीं सुना होगा कि किसी गुफा में गूंज जमकर सड़ गई हो। मानवीय रिश्ते अक्सर चिपचिपे और जटिल होते हैं, जबकि प्रकृति के रिश्ते पवनमय, किरणमय, नदीमय होते हैं और इसीलिए वे जीवनमय होते हैं।
प्रकृति के विश्वकोश में कहीं भी ‘बासीपन’ शब्द नहीं मिलता। मनुष्य की योजनाओं में जीर्णोद्धार की धूम रहती है। पुराना शिवालय जीर्णोद्धार पा सकता है, लेकिन शिव का संबंध उत्पत्ति या स्थिति से नहीं, बल्कि लय से है। प्रकृति में कुछ भी बासी नहीं है। इसका पूरा श्रेय शिव को जाता है: उत्पत्ति के कारकों के प्रतीक ब्रह्मा हैं। स्थिति या जीवन के कारकों के प्रतीक विष्णु हैं और लय के कारकों के प्रतीक शिव हैं। ये तीनों मिलकर प्रकृति अर्थात अस्तित्व को बासी नहीं होने देते।
प्रकृति हर मनुष्य को प्रेम का पाठ पढ़ाती है। पंचमहाभूत अपनी-अपनी तरह से प्रेम का संदेश देते रहते हैं: आकाश हमें प्रेम की व्यापकता और अहंकारहीनता का महत्व सिखाता है। अग्नि हमें तमोगुण जलाकर शुद्ध प्रेम की ज्योति जलाए रखने का पाठ देती है। वायु हमें प्रेम की गतिशीलता और ममता से मुक्त रहने का सबक देती है। जल हमें निर्बाध, विनम्र और खुले मन से प्रेम में बहने की सीख देता है। पृथ्वी हमें प्रेम के लिए आवश्यक स्थिरता और सहिष्णुता का सबक सिखाती है।
सूरज की परछाई नहीं होती और हवा का कोई पता नहीं होता। बादलों की गति दिशासूचक यंत्रों की गुलाम नहीं होती। पर्वत और घाटियां वियोग से परे होती हैं। दोनों का अस्तित्व निरंतर एक-दूसरे में रचा-बसा रहता है। न कोई मिलन का आयोजन, न ही विरह की पीड़ा। समुद्र की लहरें कब उछलें, इसका कोई कैलेंडर होता है क्या?
बादलों को मालूम होता है कि महासागर के भीतर क्या चल रहा है। महासागर जब आकाश से बात करता है, तभी बादल बनते हैं। सूर्य की किरणों को लहरों से झाग बनकर उठती बूंद को ऊंगली पकड़कर ऊपर ले जाना अच्छा लगता है। सदियों से ऐसा “लव अफेयर’ चलता आया है, इसलिए वर्षा होती रही है और मनुष्य तैरता रहा है।
मनुष्य कांट्रैक्ट करता है, प्रेम नहीं करता। उसकी आस्था दस्तावेज पर होती है। दस्तावेज से दहेज जन्म लेता है, लेकिन प्रेम पैदा नहीं होता। आजकल विवाह मंडपों पर प्रेम के अनुबंध होते हैं। विवाह मंडप बांधे ही इसलिए जाते हैं कि कहीं दो हृदयों को आकाश की व्यापकता का संक्रमण न लग जाए। मनुष्य की आस्था जितनी लिमिटेड कंपनी पर होती है, उतनी अनलिमिटेड अस्तित्व पर नहीं होती। साबुन के बुलबुले के भीतर बैठा आकाश हमें सहज दिखाई नहीं देता।
बात पते की :
एक बार एक साधु अपनी प्रेयसी से मिलने उसके घर गया। वहां उसने देखा कि उसकी प्रेयसी किसी अजनबी पुरुष के साथ है। बिना कुछ कहे वह साधु घर से बाहर निकल आया और थोड़ी दूर जाकर पेड़ के नीचे खड़ा हो गया।
दो-तीन घंटे बाद वह अजनबी पुरुष घर से बाहर निकला। उसने पेड़ के नीचे खड़े साधु को देखा। उसके पास जाते हुए वह सोचने लगा कि इसने मुझे उसकी प्रेमिका के साथ देख लिया है। अब यह मुझ पर टूट पड़ेगा। लेकिन हुआ बिलकुल उल्टा।
जब वह पास आया तो साधु ने शांति से कहा, काफी देर से मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था। मुझे तुमसे केवल एक ही बात कहनी है। भविष्य में जब भी तुम इस स्त्री को किसी और पुरुष के साथ देखो तो मेरी तरह चुपचाप चले जाना। याद रखना, हर छोटा पोखर महासागर का ही वंशज होता है। जैसे हर पोखर का पानी अंततः महासागर से ही आया है और उसी में जाकर मिलता है, वैसे ही जीवन की छोटी-छोटी घटनाएं, रिश्ते और परिस्थितियां भी एक बड़ी सच्चाई या मूल स्रोत (महासागर) से जुड़ी होती हैं।








