रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  इस तरह ‘जंजीर’ में हीरो बने थे अमिताभ
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: इस तरह ‘जंजीर’ में हीरो बने थे अमिताभ

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रूमी जाफरी3 घंटे पहले

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‘जंजीर’ मूवी के एक दृश्य में प्राण के साथ अमिताभ बच्चन। - Dainik Bhaskar

‘जंजीर’ मूवी के एक दृश्य में प्राण के साथ अमिताभ बच्चन।

मेरे हिस्से के किस्से में आज बात एक ऐसी फिल्म के निर्माण की, जिसने देश को सदी का महानायक यानी अमिताभ बच्चन दिया। जी हां, वो फिल्म है ‘जंजीर’। जब मेरी मुलाकात प्रकाश मेहरा जी से हुई तो उन्होंने मुझे घर बुलाया। काफी देर तक प्रकाश जी से बातें होती रहीं। मैंने कहा कि ‘जंजीर’ के बारे में मैंने इतने सारे किस्से-कहानियां सुन रखे हैं, पर मैं आपसे सुनना चाहता हूं।

उन्होंने बताया कि मुखराम शर्मा एक बहुत बड़े राइटर थे। उनसे मैंने ‘समाधि’ फिल्म की एक स्क्रिप्ट ली और धर्मेंद्र को सुनाई। धर्मेंद्र को वो फिल्म बहुत पसंद आई। मैंने कहा कि इस फिल्म से मैं बतौर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर अपना करियर शुरू करना चाहता हूं। तो धरम जी बोले कि ये स्क्रिप्ट तुम भगवंत सिंह को दे दो, मैं उनको वादा कर चुका हूं। मैंने कहा कि इतनी मुश्किल से अच्छी स्क्रिप्ट हाथ लगी है। ये मुझे बनाने दीजिए तो धरम जी बोले कि मैं तुम्हें दूसरी कहानी दे रहा हूं, एक पठान और एक पुलिस इंस्पेक्टर की कहानी। मैंने कहा, ये सुनने में तो बड़ी इंटरेस्टिंग लग रही है तो उन्होंने कहा कि मैंने इसके लेखक सलीम को पैसे भी दे दिए हैं। तुम वो कहानी सुन लो। उसके बाद मेरी मुलाकात सलीम-जावेद से हुई। उन्होंने वो कहानी मुझे सुनाई। धरम जी को तो वो पहले से ही पसंद थी। उसके पैसे भी दे चुके थे। उन्होंने इस फिल्म में काम करने के लिए हामी भी भर दी थी। फिर धर्मेंद्र जी के भाई ने पता नहीं ऐसा क्या कह दिया कि उन्होंने इस फिल्म को करने से मना कर दिया और मुझे टालते हुए बोले कि अभी मैं ‘समाधि’ कर रहा हूं, फिर ‘प्रतिज्ञा’ करूंगा। उसके बाद सोचूंगा। उसके बाद सलीम-जावेद और हम सबकी एक ही राय थी कि इस फिल्म में पठान के रोल के लिए तो सिर्फ प्राण साहब ही होने चाहिए। जब उन्होंने प्राण साहब को कहानी सुनाई तो उनको बहुत पसंद आ गई। फिल्म में उनका बहुत सपोर्ट मिला। उनका सपोर्ट नहीं होता तो ये फिल्म ही न बन पाती।

फिर हम देवानंद से मिले। उनको भी इस फिल्म की कहानी सुनाई। बहुत पसंद भी आई। उनके साथ 3-4 मीटिंग हुई, मगर देवानंद की जिद थी कि इसमें कम-से-कम 4-5 गाने डालो और थोड़ा रोमांटिक एंगल बढ़ाओ, वरना ये फिल्म नहीं चलेगी। मैंने कहा कि मैं स्क्रिप्ट तो यही रखूंगा। इस पर देव साहब बोले कि तुम कोई आर्ट फिल्म बनाने जा रहे हो? मैंने कहा, नहीं, ये आर्ट नहीं, कमर्शियल स्क्रिप्ट है। एक डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के तौर पर मेरा अपना कन्विक्शन है। लेकिन देव साहब नहीं माने।

फिर हम लोग राजकुमार साहब से मिले। उनको सुनाई तो वो बोले कि ये कहानी तो मेरी जिंदगी की कहानी है, क्योंकि राज साहब बंबई पुलिस में इंस्पेक्टर थे। लेकिन उन्होंने कंडीशन रख दी कि आने वाले डेढ़ साल तक मैं मद्रास (आज का चेन्नई) में हूं तो शूटिंग आपको वहीं करनी पड़ेगी। मैंने कहा, राज जी, वहां की लोकेशन, वहां का क्राउड, वहां की लैंग्वेज मुंबई की किसी भी चीज से मैच ही नहीं कर सकती। जमीन-आसमान का फर्क है। मैं मद्रास में शूटिंग नहीं करूंगा। तो उन्होंने भी छोड़ दी। इस बीच हमने मुमताज से संपर्क किया। उन्होंने हां कर दी। हमने साइनिंग अमाउंट भी दे दिया। फिल्म साइन हो गई। वो भी स्क्रिप्ट से एक्साइटेड थीं। फिर प्राण साहब के बेटे ने हमको ‘बॉम्बे टु गोवा’ देखने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि उसके हीरो को देखो। फिर सलीम-जावेद ने भी कहा कि अमिताभ बच्चन अच्छा एक्टर है। फिर मैं ‘बॉम्बे टु गोवा’ देखने गया। देखने के बाद मैंने जावेद अख्तर से कहा कि तुमने सही कहा था कि ये एक्टर इस रोल में जान डाल देगा, क्योंकि ये आंखों से एक्टिंग करता है। इसकी आंखों में वो एंगर है कि ये बिना बोले भी सीन कन्वे कर सकता है। इस तरह फिल्म में अमिताभ को लेने का फैसला हुआ।

इसी बात पर मुझे बशीर बद्र का एक शेर याद आ रहा है: उसकी आंखों को गौर से देखो मंदिरों में चराग जलते हैं

अमिताभ बच्चन को साइन करने के बाद हमने मुमताज से कांटैक्ट किया और उन्हें बताया कि हमने अमिताभ बच्चन को फिल्म में लिया है। तो मुमताज बोलीं कि अब मैं ये फिल्म नहीं कर पाऊंगी और उन्होंने साइनिंग अमाउंट लाकर हमें वापस कर दिया और बोलीं कि अब मैं शादी कर रही हूं। अब हमारे सामने यह समस्या आ गई कि हीरोइन किसको लें। हमने अमिताभ से कहा। उस जमाने में उनकी जया (भादुड़ी) से दोस्ती हो गई थी और मैं वैसे भी ‘समाधि’ में जया के साथ काम कर ही रहा था। तो फिर जया को अप्रोच किया और उन्होंने ‘जंजीर’ में काम करने के लिए हां कर दी। इस तरह से ये सेटअप बन पाया। इसी तरह मैंने एक दिन इस फिल्म के बारे में जावेद साहब से पूछा तो उन्होंने कहा कि रूमी साहब, ‘जंजीर’ बनने का पूरा क्रेडिट सिर्फ प्रकाश मेहरा को जाता है, क्योंकि हमने तो सिर्फ स्क्रिप्ट लिखी थी और उस जमाने में ऐसी स्क्रिप्ट लिखी थी जिसमें न म्यूजिक था, न रोमांस। ये प्रकाश मेहरा का कन्विक्शन था कि हर हीरो ना करता जा रहा था, मगर वो टस से मस न हुए। उनको इतना कॉन्फिडेंस था कि सब लोगों ने फिल्म छोड़ दी, मगर उन्होंने नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि यही बनाऊंगा, चाहे नॉन-सेलेबल एक्टर के साथ बनाऊं, क्योंकि मुझे पता है, ये बहुत बड़ी हिट होगी। तो जंजीर को याद करके इसका गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए। यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी।



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