10 घंटे पहले
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फिल्ममेकर रामानंद सागर के बेटे और प्रोडयूसर प्रेम सागर का रविवार को निधन हो गया। 84 साल की उम्र में उन्होंने आज सुबह 10 बजे अंतिम सांस ली।
प्रेम सागर का अंतिम संस्कार आज मुंबई के जुहू स्थित पवनहंस श्मशान घाट में किया जाएगा।
एक सूत्र ने NDTV को बताया, “वह कुछ समय से बीमार थे और मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती थे। रविवार को डॉक्टरों ने उन्हें घर ले जाने की सलाह दी।
प्रेम सागर के निधन पर दुख जताते हुए एक्टर अरुण गोविल ने इंस्टाग्राम पर लिखा,
रामायण टीवी सीरियल का स्वरूप देकर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से जन-जन तक भगवान श्रीराम की मर्यादा, आदर्श और शिक्षाओं को पहुंचाने वाले स्व. श्री रामानंद सागर जी के सुपुत्र एवं प्रसिद्ध फिल्म निर्माता श्री प्रेम सागर जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है। प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोक संतप्त परिवारजनों को यह गहन दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ॐ शांति


वहीं, ‘रामायण’ में ‘लक्ष्मण’ का किरदार निभाने वाले एक्टर सुनील लहिरी ने भी अपने एक्स (X) हैंडल पर दुख व्यक्त करते हुए लिखा- “यह बेहद शॉकिंग न्यूज है, हमने रामायण के रामानंद सागर जी के सुपुत्र प्रेम सागर जी को खो दिया। ॐ शांति।”

प्रेम सागर ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से ट्रेनिंग ली थी। वह 1968 बैच के छात्र थे। एफटीआईआई की पढ़ाई से उन्हें मजबूत तकनीकी आधार मिला। इसी दौरान उनकी फोटोग्राफी और सिनेमैटोग्राफी की समझ गहरी हुई।
प्रेम सागर ने सागर आर्ट्स बैनर के तले लंबे समय तक काम किया। यह प्रोडक्शन हाउस उनके पिता रामानंद सागर ने शुरू किया था। रामानंद सागर को टीवी सीरीज रामायण बनाने के लिए जाना जाता है।
बता दें कि ‘रामायण’ का पहली बार प्रसारण 1987 में दूरदर्शन पर हुआ था। प्रेम सागर ने इस बैनर के कई प्रोजेक्ट्स में स्टिल फोटोग्राफर और सिनेमेटोग्राफर के तौर पर काम किया।

‘रामायण’ में अरुण गोविल ने राम, दीपिका चिखलिया ने सीता और अरविंद त्रिवेदी ने रावण का किरदार निभाया है।
प्रेम सागर टीवी सीरीज ‘अलिफ लैला’ के डायरेक्टर थे। इसके अलावा, उन्होंने ‘काकभुशुंडी रामायण’ (2024) और ‘कामधेनु गौमाता’ (2025) जैसे धार्मिक प्रोजेक्ट्स का भी निर्माण किया। बतौर प्रोड्यूसर उन्होंने ‘हम तेरे आशिक हैं’ (1979), ‘बसेरा’ (2009) और ‘जय जय शिव शंकर’ (2010) जैसे प्रोजेक्ट्स भी किए।
फिल्मों में भी उन्होंने अपनी तकनीकी पहचान बनाई। 1968 की फिल्म ‘आंखें’ और 1972 की ‘ललकार’ में कैमरा और इलेक्ट्रिकल डिपार्टमेंट में काम किया, जबकि 1976 की ‘चरस’ में सिनेमैटोग्राफर रहे।








