SC बोला- सहमति से संबंध और रेप में अंतर:  रिलेशनशिप टूटने पर आरोप नहीं लगा सकते; शादी के वादे पर संबंध बना, साबित करना होगा
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SC बोला- सहमति से संबंध और रेप में अंतर: रिलेशनशिप टूटने पर आरोप नहीं लगा सकते; शादी के वादे पर संबंध बना, साबित करना होगा

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नई दिल्ली26 मिनट पहले

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फोटो- AI जनरेटेड - Dainik Bhaskar

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि लंबे समय तक सहमति से बना रिश्ता टूट जाए, शादी न हो पाए तो ऐसे हालात में इसे रेप नहीं माना जा सकता।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। रेप जैसे आरोप तभी लगाए जाएं जब वास्तव में जबरदस्ती, डर, दबाव या सहमति की कमी हो।

इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बदलते हुए एक वकील के खिलाफ IPC की धारा 376, 376(2)(n) और 507 में दर्ज FIR और चार्जशीट रद्द कर दी। वकील पर एक महिला ने शादी का झूठा वादा करके बार-बार रेप करने का आरोप लगाया था।

वकील ने औरंगाबाद के बॉम्बे हाईकोर्ट को मार्च 2025 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अगस्त 2024 में उसके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया था।

तीन साल चला रिश्ता, शादी नहीं हुई तो रेप का आरोप

शिकायतकर्ता महिला ने पहले अपने पति पर केस किया था और मेंटेनेंस की मांग की थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात अपीलकर्ता वकील से हुई। दोनों के बीच साल 2022 से मई 2024 तक संबंध थे। दोनों के बीच नजदीकियां भी बढ़ीं। इसी बीच जब अपीलकर्ता ने शादी की बात कही तब महिला ने अपने पिछले वैवाहिक विवाद के कारण शुरू में वकील के प्रस्ताव को मना कर दिया था।

अपीलकर्ता वकील ने कहा कि महिला ने उससे ₹1.5 लाख मांगे थे। पैसे देने से मना करने पर ही उसने उसके खिलाफ रेप का मामला दर्ज कराया। वकील ने यह भी कहा कि तीन साल के रिश्ते में महिला ने कभी किसी तरह के यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं की थी।

सुप्रीम कोर्ट- टूटे रिश्तों को अपराध बनाना गलत, असली पीड़ितों का नुकसान

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला और वकील तीन साल तक रिश्ते में थे और यह रिश्ता पूरी तरह आपसी सहमति से बना था।

बेंच ने कहा-

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हमें लगता है कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें अपीलकर्ता ने शिकायतकर्ता को सिर्फ शारीरिक संबंधों के लिए फुसलाया और फिर गायब हो गया। यह रिश्ता तीन साल तक चला, जो काफी लंबा समय है।

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कोर्ट ने ये भी कहा कि हाईकोर्ट ने इस बात पर गौर नहीं किया कि FIR में ही लिखा है कि दोनों पक्षों में रिश्ता आपसी सहमति से बना था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में सचमुच भरोसा तोड़ा जाता है और महिलाओं का नुकसान होता है। ऐसे मामलों में कानून जरूर मदद करेगा, लेकिन आरोप सबूतों पर आधारित होने चाहिए सिर्फ गुस्से या अंदाजे पर नहीं।

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