5 मिनट पहले
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स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के दौरान वोटर लिस्ट में गड़बड़ियां पहचानने के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की जानकारी देने से चुनाव आयोग ने इनकार कर दिया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने RTI के जवाब में कहा कि यह जानकारी कारोबार से जुड़े गोपनीय राज और बौद्धिक संपदा से जुड़ी है, इसलिए इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
आयोग ने यह भी साफ नहीं किया कि वोटर लिस्ट में गड़बड़ियां पहचानने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) या मशीन लर्निंग का इस्तेमाल किया गया था या नहीं।

आयोग ने कहा- SIR के लिए नया सॉफ्टवेयर नहीं बनाया
आयोग ने 16 अक्टूबर को दिए जवाब में कहा कि SIR के लिए कोई नया सॉफ्टवेयर न तो बनाया गया और न ही खरीदा गया। हालांकि, आयोग ने इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर का नाम और वर्जन बताने से इनकार कर दिया।
इसके लिए आयोग ने RTI कानून की धारा 8(1)(d) का हवाला दिया। इस धारा के तहत कारोबार के गोपनीय राज और बौद्धिक संपदा से जुड़ी कुछ जानकारियां सार्वजनिक करने से छूट मिल सकती है।
AI और मशीन लर्निंग पर सवालों का जवाब नहीं
आवेदक ने पूछा था कि क्या वोटर लिस्ट की जांच में AI, मशीन लर्निंग या दूसरे ऑटोमेटेड टूल्स का इस्तेमाल हुआ। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि गलत रिकॉर्ड की पहचान से बचने के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं।
आयोग ने कहा कि ये सवाल स्पष्टीकरण मांगते हैं। RTI कानून की धारा 2(f) के तहत ऐसे सवालों का जवाब देना जरूरी नहीं है, क्योंकि इन्हें उपलब्ध रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी नहीं माना गया।
RTI में पूछा था- रिकॉर्ड की जांच कौन करता है?
आवेदक ने यह भी पूछा था कि सॉफ्टवेयर जिन रिकॉर्ड को जांच के लिए अलग करता है, उनकी समीक्षा कौन करता है। इस सवाल पर आयोग ने RTI कानून की धारा 8(1)(g) का हवाला दिया।
हालांकि, आयोग ने बताया कि वोटर लिस्ट तैयार करने और उसमें बदलाव करने की कानूनी जिम्मेदारी संबंधित विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) की होती है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने आवेदक को सक्षम अधिकारी के पास अपील करने की सलाह दी। इसके जरिए वह आयोग के जवाब को चुनौती देकर मांगी गई जानकारी हासिल करने की कोशिश कर सकता है।
SIR पर पहले भी उठे सवाल, दावा- दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई
- 25 सितंबर: इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई थी। इसमें मतदाता सूची के डेटा पर नियंत्रण और अधिकारियों को जानकारी नहीं दिए जाने के मुद्दे भी शामिल थे। पूरी खबर पढ़ें…
- 26 सितंबर: चुनाव आयोग ने अपने बयान में कहा कि मनीष गर्ग के काम के बंटवारे संबंधी आदेश लागू नहीं किए गए थे और IT विभाग की निगरानी वास्तव में नहीं हटाई गई थी।
- 3 अक्टूबर: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मनीष गर्ग की भूमिका और आयोग के IT सिस्टम से जुड़े कामकाज पर सवाल उठाए थे।
- 21 अक्टूबर: RTI से मिली जानकारी के मुताबिक दोनों आयुक्तों के पत्र कैबिनेट सचिवालय पहुंचे थे और आगे संबंधित अधिकारियों को भेजे गए। पत्रों में क्या था, यह सामने नहीं आया था।









