‘चेतन के पास अच्छा पैसा था। फॉर्च्यूनर गाड़ी थी। वह गाड़ियों के फाइनेंस का काम करता था। पुराने मकान खरीदकर उन्हें बेचता था। यहीं एकता पार्क (दिल्ली) के पास शालीमार बिल्डिंग में रहता था। फिर पता नहीं क्या हुआ…कर्जदार होता चला गया।… अगर ये लोग बच्चियों को अपने साथ सुलाते तो ऐसी कहानी थोड़ी होती।’ […]





