अर्घ्य सेनगुप्ता का कॉलम:  अदालतों का काम विवादों को सुलझाना है बढ़ाना नहीं
टिपण्णी

अर्घ्य सेनगुप्ता का कॉलम: अदालतों का काम विवादों को सुलझाना है बढ़ाना नहीं

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न्याय-तंत्र में एक खास तरह का आत्मविश्वास होता है, जो उसे जीवन के बड़े सवालों पर फैसला सुनाने में सक्षम बनाता है। इसमें न झिझक होती है, न कोई आत्मसंदेह, बल्कि उस व्यक्ति जैसी निर्णायकता होती है, जिसने अपने सामने आई याचिकाओं को अच्छे से पढ़ लिया हो और दलीलों पर सावधानी से विचार कर लिया हो। तब उसके निर्णयों में किसी दुविधा या आधे-अधूरेपन की गुंजाइश नहीं होती है। भोजशाला मामले को ही लें। अदालत के समक्ष सवाल था कि क्या भोजशाला परिसर- जहां कमाल मौला मस्जिद बताई जाती थी- उसका मूल चरित्र हिंदू मंदिर का है? क्या वहां शुक्रवार को नमाज तथा मंगलवार और बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा की व्यवस्था जारी रहना चाहिए? अदालत ने परिसर को मंदिर माना और हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति दे दी। मुस्लिमों को मस्जिद निर्माण के लिए कहीं और उपयुक्त जमीन मांगने का आवेदन करने की अनुमति दे दी। लेकिन ऐसे निर्धारणों को रोकने के लिए ही उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 बनाया गया था। इस कानून ने भारत के हर उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त 1947 की स्थिति पर स्थिर कर दिया था। सिर्फ बाबरी मस्जिद विवाद की विशेष प्रकृति को देखते हुए उसे अपवाद रखा गया था। लेकिन अब एक कमजोर कड़ी खोज ली गई है। दरअसल, अधिनियम में प्राचीन और संरक्षित स्मारकों के लिए एक सीमित अपवाद रखा गया था। वह यह कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित ऐसे हेरिटेज स्मारकों के मामले में आजादी के समय की धार्मिक स्थिति को स्थिर मानने और नए मुकदमे दायर करने पर लगी रोक लागू नहीं होगी। इसके पीछे के तर्क को भी समझा जा सकता है, क्योंकि हो सकता है भविष्य में कई और पुरातात्विक अवशेष मिल जाएं। लेकिन यह सीमित अपवाद था, न कि इस कानून की मूल भावना को दरकिनार करने का खुला निमंत्रण कि सौ साल से पुराने हर ढांचे को खोदकर खंगाला जाए। अब जब हाईकोर्ट ने मान लिया है कि यह अपवाद नियम से बड़ा है तो इस स्थिति में जब तक सुप्रीम कोर्ट ही अपील में अलग राय न जता दे, उपासना स्थल अधिनियम लगभग निष्प्रभावी हो गया है। अब सौ साल से ज्यादा पुराना हर स्मारक अदालत में मुकदमे का इंतजार करेगा। और हमें पता है कि क्या मिलेगा- मस्जिदों के नीचे शायद मंदिरों के अवशेष, उनके नीचे शायद बौद्ध अवशेष और शायद और नीचे उससे भी पुराने अवशेष। लेकिन उपासना स्थल अधिनियम इसलिए नहीं बनाया गया था कि संसद को यह इतिहास पता नहीं था। बल्कि इसलिए बनाया गया था, क्योंकि संसद समझती थी कि हर अवशेष पर दोबारा मुकदमे करने, हर घाव को फिर से कुरेदने, हर मस्जिद और मंदिर को अदालत में ले जाने से देश प्रगति नहीं करेगा। एक अन्य मामले में पांच मुस्लिमों को गंगा में मांसाहारी भोजन फेंकने के लिए गिरफ्तार किया गया। जज ने जमानत के विरोध में आईं दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि आरोपी खेद जता चुके हैं, उनका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड भी नहीं है, इसलिए उन्हें जेल में रखने का औचित्य नहीं। इसके बावजूद उन्होंने यह भी टिप्पणी कर दी कि मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा गंगा में मांसाहारी भोजन फेंकने को हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला कहा जा सकता है। अदालत यह भी कह सकती थी कि किसी भी तरह का बचा हुआ खाना नदी में फेंकना गलत है। यह मानना कठिन है कि हिंदुओं को गंगा में मांस फेंकने से तो आपत्ति होगी, पर प्लास्टिक, औद्योगिक कचरा और अपशिष्ट बहाने से नहीं। लेकिन जब अदालतें आस्था से जुड़े प्रश्नों में उतरती हैं तो अकसर राजनीतिक तौर पर प्रभावी पहलू को पकड़ लेती हैं। इससे विवाद और बढ़ते ही हैं। उपासना स्थल अधिनियम इसलिए नहीं बनाया गया था कि देश की संसद को हमारा इतिहास पता नहीं था। बल्कि इसलिए बनाया गया था, क्योंकि संसद समझती थी कि हर घाव को फिर से कुरेदने से देश प्रगति नहीं करेगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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