58 मिनट पहले
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गूगल सीईओ पिचाई, ट्रम्प के अटलांटिक महासागर के नाम बदलने के विचार पर असहमति जताने से चर्चा में है। सुंदर अपने स्पष्ट विचारों के लिए जाने जाते हैं। कई मुद्दों पर उनके विचार, उन्हीं की जुबानी… अगर हम अपने आसपास की दुनिया को देखें, तो समझ आएगा कि हम हर पल सीख रहे हैं। हम चीजों को देखते हैं, उनकी आवाज सुनते हैं, उनके बीच का रिश्ता समझते हैं और अपने पुराने अनुभवों से नए फैसले लेते हैं। इंसान की बुद्धि सिर्फ जानकारी जमा करने से नहीं बनी है। हम दुनिया को समझते हैं, उसके नियमों को पहचानते हैं और फिर उस समझ का इस्तेमाल करते हैं। मेरा मानना है कि एआई को भी इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा। उसे सिर्फ शब्दों और आंकड़ों को समझने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, यह भी समझना चाहिए कि असली दुनिया कैसे काम करती है। चीजें कैसे चलती हैं और किसी काम को करने के लिए किन बातों का ध्यान रखना पड़ता है। जब एआई दुनिया के नियमों को बेहतर ढंग से समझेगा, तभी वह इंसानों की ज्यादा अच्छी मदद कर पाएगा। इस दिशा में हम कई तरह के तरीकों पर काम कर रहे हैं। रोबोटिक्स इसका एक अच्छा उदाहरण है। रोबोट को सिर्फ निर्देश देना काफी नहीं है। उसे अपने आसपास की चीजों को समझना होगा, उनके हिसाब से अपने काम करने का तरीका बदलना होगा और जरूरत पड़ने पर सही फैसला लेना होगा। हम दुनिया के ऐसे मॉडल बनाने पर काम कर रहे हैं, जो असली दुनिया के काम करने के तरीके को समझ सकें। इसी अनुभव से हमें रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में भी मदद मिलती है। मेरा यह भी मानना है कि आने वाले समय में एआई बनाने के अलग-अलग तरीके एक-दूसरे के और करीब आ सकते हैं। लेकिन अभी हम इसे समझदारी की ऐसी सीमा की तरह देखते हैं, जहां कई रास्ते खुले हुए हैं। हमें इन सभी रास्तों को समझना और उनमें बेहतर काम करना है। इससे हमारी रिसर्च और भी ज्यादा मजबूत होगी, नई बातें सीखने को मिलेंगी और हम ज्यादा सक्षम एआई बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ पाएंगे। यहां से एक बहुत जरूरी सीख निकलती है। जब हम किसी बड़ी समस्या को हल करने निकलते हैं, तो यह जरूरी नहीं कि शुरुआत में ही हमें उसका एक सही रास्ता मिल जाए। कई बार हमें बहुत अलग-अलग तरीके आजमाने पड़ते हैं। हर तरीके से कुछ नया सीखने को मिलता है। किसी एक रास्ते को पकड़कर बैठ जाने के बजाय हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कौन-सा तरीका कहां काम आ सकता है। यही सोच नई खोजों और बेहतर काम की बुनियाद बनती है। टेक्नोलॉजी अपने आप समाज की भलाई नहीं कर देती। उसे सही दिशा में ले जाने के लिए इंसानों को ही मेहनत करनी पड़ती है। हमें यह सोचना पड़ता है कि उसका फायदा किसे मिल रहा है, उससे लोगों की जिंदगी में क्या बदलाव आ रहा है और कहीं उसका गलत इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है। सिर्फ कुछ नया बना लेना हमारी आखिरी मंजिल नहीं हो सकती। असली मंजिल तो यह होनी चाहिए कि उस नई चीज से इंसान की जिंदगी लगातार पहले से बेहतर बने।
फैसला उत्साह पर नहीं, समझदारी पर टिका हो आप अपना काम शुरू करना चाहते हैं। आपके पास एक अच्छा विचार है और आपको भरोसा है कि वह सफल होगा, तो यह भी देखना होगा कि लोगों को उसकी जरूरत है या नहीं। उसे बनाने में कितना खर्च आएगा, आपके पास कितने संसाधन हैं? आगे की जरूरतों को कैसे पूरा करेंगे? सपने देखें, लेकिन समझदारी के साथ। (तमाम इंटरव्यू में)








