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- According To Expert Debbie, People Started Considering Ugliness As Beauty.
टाइम.न्यूयॉर्क1 घंटे पहले
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डेबी मिलमैन न्यूयॉर्क के सेंटर ऑफ विजुअल आर्ट्स की को-फाउंडर हैं।- फाइल फोटो
‘मैं जब सुबह की सैर पर निकलती, तो शांत और हरे-भरे मोहल्ले में एक पुराना, खूबसूरत सा घर हमेशा मेरा ध्यान खींचता था। लेकिन एकाएक अचानक वह घर गायब हो गया। उसकी जगह कंक्रीट के विशाल ढांचे ने ले ली, जिसे देखकर लगता था मानो उसने अपनी ही जमीन को निगल लिया हो। न कोई खुला बगीचा, न हरियाली…जमीन के आखिरी छोर तक सिर्फ दीवारें ही दीवारें। वह घर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में फैला हुआ विशालकाय बॉक्स लग रहा था।
सहसा मन में सवाल कौंधा… क्या हमारी दुनिया पहले से कहीं ज्यादा बदसूरत होती जा रही है? आसपास नजरें दौड़ाईं, तो यह बीमारी हर जगह फैली दिखी। सड़कें चौड़ी थीं, लेकिन उन पर दौड़ने वाली गाड़ियां किसी युद्ध के हथियार जैसी आक्रामक, भारी-भरकम और चौकोर हो चुकी थीं- जैसे टेस्ला का ‘साइबरट्रक’, जिसे देखकर लगे कि वह किसी अनजान बहस को जीतने निकला है। फैशन की दुनिया में कदम रखा तो देखा कि युवा पीढ़ी ऐसे बेढंगे, बड़े-बड़े जूते और अत्यधिक ढीले कपड़े पहन रही है, जो सुंदरता के पारंपरिक नियमों को सीधे चुनौती देते हैं।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लोगों की पसंद बदल रही है। सुंदरता हमेशा से व्यक्तिगत और समय के साथ बदलने वाली रही है। असली समस्या है ‘रेशियो’ और ‘संदर्भ’ का खो जाना। अच्छा डिजाइन अपने माहौल से संवाद करता है। कुर्सी आराम दे, किताब का फॉन्ट आंखों को न चुभे और इमारत आसपास के सौंदर्य में सहजता से घुल जाए…। लेकिन आज की ‘अटेंशन इकोनॉमी’ में उद्देश्य उपयोगिता नहीं, बल्कि तुरंत ध्यान खींचना बन गया है। वही चीज सफल मानी जाती है जो स्क्रीन पर चौंकाए और तुरंत साझा की जा सके। रेस्त्रां स्वाद से ज्यादा सोशल मीडिया की तस्वीरों के लिए डिजाइन हो रहे हैं। हर उत्पाद, स्थान और दृश्य दूसरों से अलग दिखने की होड़ में है, मानो अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए लगातार शोर मचा रहे हों।
फैशन में बदसूरती का प्रयोग नया नहीं है। प्राडा का ‘अग्ली चिक’ कलेक्शन इसका चर्चित उदाहरण रहा। अजीब कपड़े या जूते पहनना कलात्मक विद्रोह हो सकता है, क्योंकि उन्हें बदला जा सकता है। पर इमारतें और विशाल वाहन स्थायी होते हैं, जो हमारी साझा दुनिया और रोजमर्रा के अनुभव को प्रभावित करते हैं।
महान इतालवी डिजाइनर मैसिमो विग्नेली का मानना था कि डिजाइन का उद्देश्य दुनिया से फूहड़ता कम करना है। बदसूरती कभी-कभी विचारपूर्ण और कलात्मक हो सकती है, लेकिन फूहड़ता तब जन्म लेती है जब जरूरत से ज्यादा आकार, शोर और दिखावा सुंदरता को दबा देते हैं। हम जो चीजें बनाते और खरीदते हैं, वे हमारे मूल्यों को दर्शाती हैं। आज की विशाल, कर्कश और असंतुलित दुनिया हमारी कभी न खत्म होने वाली चाहत का प्रतिबिंब है। यही हमें एक अहम सवाल के सामने खड़ा करती है: आखिर कितना काफी है…?’ (डेबी मिलमैन न्यूयॉर्क के सेंटर ऑफ विजुअल आर्ट्स की को-फाउंडर हैं।)








