टिपण्णी

एन. रघुरामन का कॉलम: आजीविका जीवन बनाए रखने वाली हो, जीवन को खतरे में डालने वाली नहीं

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पिछले शुक्रवार की शाम पुणे के पिंपरी सौदागर निवासी 43 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट मनोज मालपानी ने खुद को एक असामान्य और संभावित तौर पर खतरनाक स्थिति में पाया। वे मुंबई एयरपोर्ट से पुणे तक एक कैब में जा रहे थे। उन्होंने देखा कि ड्राइवर बार-बार जम्हाई ले रहा था और जागे रहने के लिए संघर्ष कर रहा था। कम से कम दो बार तो लगा कि ड्राइवर स्टियरिंग पर ही झपकी ले रहा है। मालपानी डर गए। वे मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे पर थे, जहां पलभर की लापरवाही जानलेवा हो सकती है। रात करीब 8.30 बजे जब कैब एक फूड मॉल पर रुकी तो मालपानी ने ड्राइवर से इस बारे में पूछा। ड्राइवर ने माना कि लगातार ड्यूटी करने से वह थक चुका था और उसे नींद आ रही थी। मालपानी ने ड्राइवर को आराम करने के लिए कहा और खुद गाड़ी चलाने की पेशकश की। ड्राइवर तुरंत तैयार हो गया। उसने अपनी सीट पीछे की और सो गया। मालपानी ने पहले टोल प्लाजा तक गाड़ी चलाई। वहां भी ड्राइवर को उनींदा देखकर उन्होंने लगातार पुणे तक गाड़ी चलाई और रात करीब 10.30 बजे मंजिल पर पहुंचे। उन्होंने ड्राइवर को जगाकर गाड़ी सौंपी और किराया चुकाया। उन्होंने माना कि उन्हें किसी दूसरे की कैब नहीं चलानी चाहिए थी, लेकिन उन्हें जान की परवाह थी तो ऐसा किया। इसके बाद उस कैब एग्रीगेटर ने उस ड्राइवर का अपने एप तक एक्सेस खत्म कर दिया और मालपानी को किराए की रकम क्रेडिट के रूप में रिफंड कर दी। लेकिन यह घटना एप-बेस्ड ड्राइवरों की कामकाजी परिस्थितियों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। इंडियन गिग वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष केशव क्षीरसागर बताते हैं कि ड्राइवरों के काम के घंटे तय नहीं हैं और कम आय के कारण उन पर लगातार काम करने का दबाव रहता है। इस घटना ने मुझे मुंबई की मिडिल-इनकम हाउसिंग सोसायटियों के एक आम नजारे की याद दिला दी- गेट पर चौकीदार गहरी नींद में सो रहा होता है और कोई नाराज निवासी उसे जगाता है। दोनों स्थितियां अलग लग सकती हैं, लेकिन इनमें एक बात समान है। दोनों ही मामलों में ऐसे वर्कर्स हैं, जिनसे सतर्क रहने की उम्मीद की जाती है, लेकिन उनकी कमाई शायद ही इतनी होती है कि रोजमर्रा की जरूरतें पूरी कर पाएं। रेजिडेंशियल सोसायटियों में आउटसोर्सिंग एजेंसियों के जरिए नियुक्त सिक्योरिटी गार्डों को ही देखिए। इनमें से कई को 30 दिनों की शिफ्ट के बदले 10 हजार रुपए से भी कम मिलते हैं। इतनी कम कमाई में परिवार चलाना मुश्किल है, खासकर मुंबई जैसे महंगे शहर में। किराया, खाना, स्कूल फीस, दवाइयां और आने-जाने का खर्च वेतन के दिन का इंतजार नहीं करते। इसलिए कुछ गार्ड दूसरी शिफ्ट भी कर लेते हैं, ताकि महीने में करीब 20 हजार रुपए कमा सकें। वे दिन में 18 से 20 घंटे काम करने लगते हैं। ऐसे में आने-जाने, खाना खाने और ठीक से सोने के लिए बहुत कम समय बचता है। नींद की कमी से कॉन्सन्ट्रेशन, जजमेंट, रिएक्शन टाइम और इमोशनल कंट्रोल प्रभावित होते हैं। अंतत: शरीर वह चीज मांगने लगता है, जिसकी इजाजत जेब नहीं देती- आराम। आराम की कमी से कोई सिक्योरिटी गार्ड कम चौकन्ना, कोई ड्राइवर कम रेस्पॉन्सिव हो सकता है और किसी डिलीवरी वर्कर के गलती करने की आशंका बढ़ सकती है। सेफ्टी-सेंसेटिव जॉब्स में तो इसके नतीजे गंभीर हो सकते हैं। लंबे समय में इसकी एक और कीमत चुकानी पड़ती है। लगातार थकान और अपर्याप्त रिकवरी शारीरिक और मानसिक सेहत खराब कर सकती है। एक्स्ट्रा शिफ्ट के जरिए की गई कमाई की कीमत सेहत से चुकानी पड़ सकती है। आगे चलकर मेडिकल बिलों का खर्च परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है। महीने में एक पगार पर जी रहे वर्कर के लिए किसी एक्स्ट्रा शिफ्ट का मतलब समय पर स्कूल की फीस भर पाना या परिवार का राशन खरीद पाना हो सकता है। सेहत के लिहाज से कोई काम ठुकरा देना समझदारी भरा फैसला हो सकता है, लेकिन सर्वाइवल के लिए ऐसा करना कई बार नामुमकिन होता है। फंडा यह है कि सर्वाइवल के लिए एक वर्कर कब तक अपनी नींद की कीमत चुकाता रहेगा? देर-सबेर उसकी सेहत जवाब दे ही देगी। समाज के तौर पर जब तक हम इस हकीकत को नहीं समझेंगे और अपने वर्कर्स को एक शिफ्ट के काम से ही बुनियादी जरूरतें पूरी करने लायक वेतन नहीं देंगे, तब तक हमें ऐसी सेवाएं ही मिलती रहेंगी, जो हमारे जीवन और प्रॉपर्टी को गंभीर जोखिम में डाल सकती हैं।



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