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- N. Raghuraman’s Column Are We Abandoning Necessities And Adopting ‘manufactured Cravings’?
2 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
दुनियाभर में, खासकर अमेरिका में सुबह के समय स्टारबक्स पर भीड़ बहुत रहती है। ग्राहक काउंटर तक पहुंचने से पहले ही मोबाइल एप से गरम कॉफी ऑर्डर करते हैं। झट से कप उठाया, मेट्रो में बैठे और दफ्तर निकल पड़ते हैं। डेस्क पर पहुंचने तक बड़े-से कप को सिप करते रहते हैं।
हालांकि, जैसे ही कैफीन का असर कम होने लगता है, कंपनी का कामकाज धीमा हो जाता है। लाइटें तो जली रहती हैं, पर चहल-पहल कम हो जाती है। सुस्त दोपहरों में ट्रांजेक्शन बढ़ाने के लिए सीईओ ब्रायन निकोल ने ‘दोपहर’ को ही प्रभावी तरीके से ‘ब्रांड’ किया है। कंपनी ने डिजिटल मेनू बोर्ड पर माचा ड्रिंक्स, प्रोटीन एनर्जी बॉल्स, फ्लैटब्रेड जैसे आइटम दिए हैं, जिन्हें लंच बाद की सुस्ती के लिए उपयुक्त बताया जाता है। ग्राहक जल्द इन नई आदतों के आदी हो गए।
स्टारबक्स ने ऐसे फूड आइटम पर फोकस किया है, जो ‘क्रेवेबल’, उच्च गुणवत्ता, कम शुगर वाले हैं। इन्हें ऐसे बनाया है कि वे अपीलिंग और ट्रेंडी दिखें। नतीजतन, पिछले साल कंपनी ने 16% वृद्धि दर्ज की। दुर्भाग्य से, भारतीय उपभोक्ता भी अब अमेरिका जैसा खरीद व्यवहार अपना रहे हैं।
दशकों पहले, हम वास्तविक जरूरत की चीजें ही खरीदते थे। घरों में अत्यधिक सामान जमा नहीं करते थे, क्योंकि तब तनख्वाहें दो या तीन अंकों में होती थीं और पैरेंट्स ‘घर की नैया पार करने’ की जद्दोजहद में रहते थे।
चूंकि कोई भी अपने आर्थिक संघर्ष जगजाहिर नहीं करना चाहता, इसलिए लोग थोक के बजाय स्थानीय बाजारों से छोटी खरीदारी करते थे। कभी–कभार अलग–अलग रसोई वाले बड़े परिवार थोक में सामान खरीदकर आपस में बांट लेते थे– ऐसा तरीका, जो करीबी दोस्तों के बीच भी अपनाया जाता था।
इसी व्यवहार ने व्यापारियों को कम कीमत पर बड़े पैक देने का आइडिया दिया। 1999 के आसपास जब मॉल शुरू हुए तो रिटेल मार्ट्स ने इस संस्कृति को मुख्यधारा में ला दिया। जब मॉल्स में ट्रॉली आईं और खरीदारों को गलियारों में रखा सामान खुद उठाने के लिए प्रोत्साहित किया गया तो यहीं से खरीदारी का मनोविज्ञान बदल गया।
हम कीमत देखना भूल गए। जिन सामानों की मौजूदा महीने में जरूरत नहीं होती, हम वो भी खरीदने लगे। तर्क होता कि चलो, बाद में काम आएगा। इसी बदलाव से विनिर्माता हमें एक साथ चार टूथब्रश खरीदने पर कन्वींस कर पाए– ऐसी आपूर्ति, जो परंपरागत तौर पर कई महीने चलेगी। फिर आया ‘प्राइवेट लेबल’ का दौर, जिसमें उत्पाद की शुद्धता और खास स्रोत का दावा किया जाता है। यदि बाजार ने ‘नो मैदा’ की मांग की तो उनके पास विकल्प था।
लोगों ने ‘डिकैफ’ चाहा तो बिना कैफीन का कॉफी पाउडर बनाया और होल व्हीट ब्रेड मांगी गई तो भी उन्होंने दी। उन्होंने खुद को ‘क्लीन लेबल’ बताया। इससे ग्राहकों को ‘इवॉल्व्ड कस्टमर’ कहा जाने लगा। लोग ऐसे स्टोर्स से बाहर निकलते हुए गर्व महसूस करते, क्योंकि वे जानते थे कि इन लेबल्स के साथ वे लोगों की नजरों में आ रहे हैं। इन आधुनिक ग्राहकों की पसंद ऐसी हो गई है, जिसकी हमारे पूर्वजों ने कल्पना भी नहीं की थी।
इनसे पूछना चाहिए कि जब हमें सिर्फ कॉफी चाहिए तो ‘चॉकलेट-कोटेड कॉफी’ की क्या जरूरत? कभी हम स्थानीय चने वाले से एक रुपए की मूंगफली लेकर ही आनंद लेते थे तो क्या ऊंची कीमतों पर कड़ी पत्तों के साथ भुनी 100 ग्राम मूंगफली खरीदने की वाकई जरूरत है? ये उत्पाद जानबूझकर आपके सामने रखे जाते हैं। आप इन्हें नहीं खोजते, लेकिन आपको महसूस कराया जाता है जैसे आपने इन्हें ‘खोज’ लिया हो।
फिर आप दोस्तों के बीच इनका दिखावा करते हैं। अमेरिका में पहले से चल रहा एक नया ट्रेंड भी अब आपके इंतजार में है– मेंबरशिप आधारित ग्रोसरी शॉपिंग। इस मॉडल में कुछ खास उत्पाद सिर्फ मेम्बर्स के लिए ही उपलब्ध होते हैं। इससे एक कृत्रिम सामाजिक विभाजन बनता है। उद्देश्य है कि आम आदमी की इस ‘मेम्बरशिप स्टेटस’ के प्रति भूख बढ़ाई जाए।
फंडा यह है कि समझदार बने रहें और सच में जरूरी किराने की चीजों और बाजार द्वारा निर्मित ‘जरूरतों’ के बीच अंतर करना सीखें।









