एन. रघुरामन का कॉलम:  रविवार एक अर्जित स्वतंत्रता का दिन हो सकता है- यदि उसका कुछ हिस्सा भविष्य की योजना बनाने में लगाया जाए।
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एन. रघुरामन का कॉलम: रविवार एक अर्जित स्वतंत्रता का दिन हो सकता है- यदि उसका कुछ हिस्सा भविष्य की योजना बनाने में लगाया जाए।

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यदि आप यह मानते रहे हैं कि दो दिन का सप्ताहांत या रविवार की छुट्टी आपके हक का पर्सनल टाइम है, तो आपको यह भी जानना चाहिए कि यह कॉन्सेप्ट कैसे और किस उद्देश्य से शुरू हुआ था। आप यह तो मानेंगे कि किसी अच्छी पहल की शुरुआत अपने घर से करना सार्थक बदलाव लाने का प्रभावी तरीका है, क्योंकि इससे आइडियाज़ को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले कम जोखिम वाले वातावरण में परखा जा सकता है। 1926 में हेनरी फोर्ड ने भी यही सोचा था। उन्होंने पांच दिन या 40 घंटे का वर्क-वीक लागू करने का निर्णय लिया था। उन्होंने यह निर्णय फेयर लेबर स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत इस सुविधा को अमेरिका में फेडरल मैंडेट बनाए जाने से 12 वर्ष पहले ही ले लिया था। उन्होंने यह कदम तब क्यों उठाया, जब खुद सरकार ने इसे कानून नहीं बनाया था? क्योंकि वे अपने कर्मचारियों को उपभोक्ता वर्ग में बदलना चाहते थे। जब श्रमिक यूनियनें दशकों से “आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपने लिए’ की मांग को लेकर हड़तालों और प्रदर्शनों के माध्यम से संघर्ष कर रही थीं, तब इस दूरदर्शी उद्यमी ने एक तीर से दो निशाने साधने की सोची- श्रमिकों के पलायन को रोकना और उन्हें दिए वेतन को उनके अपने उत्पादों पर खर्च करवाना। उनका सिद्धांत यह था कि पर्याप्त विश्राम पाने वाला श्रमिक न केवल अधिक उत्पादक होगा, बल्कि फुरसत में की जाने वाली गतिविधियों- जैसे यात्रा और खरीदारी की ओर भी आकर्षित होगा- जिनके लिए ऑटोमोबाइल की आवश्यकता होती है। इस तरह बिना वेतन में कटौती किए कर्मचारियों को दो दिन की छुट्टी देकर उन्होंने प्रभावी रूप से अपने ही उत्पादों के लिए मांग का निर्माण किया। हेनरी फोर्ड ने कहा था कि फुरसत का समय एक बढ़ते हुए उपभोक्ता बाजार का अनिवार्य घटक है, क्योंकि कामकाजी लोगों के पास इतना समय तो होना चाहिए कि वे उत्पादों के उपयोग के तरीके खोज सकें। अगर लोग हमेशा काम में व्यस्त रहेंगे तो उनके पास कार रखने का कोई कारण नहीं होगा। इस तरह, रविवार या सप्ताहांत एक तरफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक भी हो सकता है तो दूसरी ओर एक सुनियोजित आर्थिक रणनीति भी, जो आपके बैंक खाते को खाली कर सकती है। यह इस पर निर्भर करता है कि आपका नजरिया और आदतें क्या हैं। जब रविवार उपभोग का पीक बन जाते हैं- लोग वर्क-वीक शुरू होने से पहले राहत की तलाश में बाहर खाने, फूड डिलीवरी और मनोरंजन पर अधिक खर्च करते हैं- तो आपके सामने दो विकल्प होते हैं : रविवार एक फाइनेंशियल-ड्रेन के रूप में : 1. रीटेलर्स सीमित समय के संडे ऑफर या विशेष पैकेज (जैसे गेम नाइट या फैमिली ब्रंच) का उपयोग करते हैं, ताकि उपभोक्ता ऐसी इम्पल्सिव खरीदारी करें, जिन्हें वे सामान्यतः सप्ताह के दौरान नहीं करते। 2. देर रात तक स्क्रॉल करने या फूड डिलीवरी ऐप्स का उपयोग करने जैसी आधुनिक आदतें ऐसी क्वाइट-लीक्स पैदा करती हैं, जिनमें रविवार की शामों के कई छोटे लेनदेन मिलकर महीने में बड़ी राशि बन जाते हैं। 3. मार्केटर पारिवारिक जुड़ाव या नॉस्टेल्जिया जैसी भावनाओं का दोहन इस तरह से करते हैं कि उसके अनुभव के लिए खर्च करना जरूरी महसूस होने लगता है और अंततः नकदी प्रवाह पर दबाव पड़ता है। रविवार स्वतंत्रता या अवसर के रूप में : 1. रविवार को पिछले सप्ताह के खर्चों की समीक्षा करने से फिजूलखर्ची के पैटर्न की पहचान होती है और आने वाले सप्ताह के लिए समायोजन किया जा सकता है। 2. कई सफल वित्तीय रणनीतियां सुझाव देती हैं कि हर रविवार 20 मिनट अपने रिकॉर्ड्स को व्यवस्थित करने, बजट को अपडेट करने या बचतों को ऑटोमेट करने में लगाएं- इस तरह यह केवल उपभोग ही नहीं, बल्कि वित्तीय योजना का भी दिन बन जाता है। 3. रविवार का उपयोग परिवार के साथ बैठकर दीर्घकालिक लक्ष्यों को तय करने और वित्तीय स्वतंत्रता की रूपरेखा तैयार करने के लिए करें। फंडा यह है कि रविवार एक अर्जित स्वतंत्रता का दिन हो सकता है- यदि उसका कुछ हिस्सा भविष्य और सेवानिवृत्ति की योजना बनाने में लगाया जाए। या फिर वह उन मार्केट-लीडर्स की रणनीति बन सकता है, जो अपना बैंक खाता भरना और आपका खाली करना चाहते हैं। तो इस रविवार को आप क्या चुनेंगे?



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