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अब तक माना जाता था कि उम्र जन्मतिथि से तय होती है पर विज्ञान की दुनिया में हुए एक नए और क्रांतिकारी आविष्कार ने इस सोच को बदल दिया है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ‘मॉलिक्यूलर क्लॉक’ (आणविक घड़ी) तैयार की है, जो इंसानों की जीन गतिविधि के आधार पर उनकी वास्तविक जैविक (बायोलॉजिकल) उम्र और यहां तक कि उनकी मौत के संभावित समय की भविष्यवाणी कर सकती है। ‘नेचर’ मैगजीन में प्रकाशित शोध के अनुसार, यह अनूठी घड़ी न सिर्फ इंसानों पर, बल्कि चूहों, चुहियों और बंदरों (मैकाक) पर भी सटीक काम करती है। हालांकि यह तकनीक अभी चिकित्सा उपयोग के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है, पर भविष्य में यह एंटी-एजिंग दवाओं और जीवनशैली में बदलावों के असर को मापने में मील का पत्थर साबित हो सकती है। आमतौर पर उम्र को बीतते हुए वर्षों से नापते हैं, जिसे क्रोनोलॉजिकल उम्र कहा जाता है। पर हमारी कोशिकाओं की घड़ी हमारे स्वास्थ्य व पर्यावरण के हिसाब से कभी धीमी तो कभी तेज चलती है। इसे ही ‘बायोलॉजिकल उम्र’ कहते हैं। पहले वैज्ञानिक डीएनए पर रासायनिक निशान (एपीजेनेटिक क्लॉक) देखकर उम्र का अनुमान लगाते थे। पर हार्वर्ड के शोधकर्ता वादिम ग्लैडिशेव व उनकी टीम ने रासायनिक निशानों के बजाय सीधे जीन्स की सक्रियता पर फोकस किया। उम्र बढ़ने के साथ जो जीन्स कम या ज्यादा सक्रिय होते हैं, वे शरीर के भीतर चल रहे नुकसान की पूरी कहानी बयां कर देते हैं। इस ब्लॉक के लिए शोधकर्ताओं ने 11 हजार लोगों के डेटा व चार प्रजातियों के 25 से ज्यादा टिश्यू का विश्वलेषण किया। उन्होंने पाया कि बुढ़ापे के कई लक्ष्ण इंसानों व जानवरों में समान होते हैं। इस खोज से वैज्ञानिक उलक्षन में है। वे तय नहीं कर पा रहें है कि जीन गतिविधि में बदलाव बुढ़ापे की वजह है या सिर्फ असर। सह लेखकर अलेक्जेंडर त्यशकोवस्की बताते हैं, यह घड़ी शरीर में जमा कुल जैविक नुकसान दर्शाती है। आम लोगों तक पहुंचने से पहले इसें अलग-अलग आबादी और परिस्थितियों में परखना होगा। फिलहाल यह किसी व्यक्ति की मौत की तारीख तय नहीं कर सकती , बल्कि पूरी आबादी के स्वास्थ्य पैटर्न समझने का अच्छा जरिया है।
पुरानी बीमारी का सामना हुआ तो घड़ी की रफ्तार तेज हो गई: स्टडी इंसानों पर किए गए एक बड़े हृदय-स्वास्थ्य अध्ययन में इस घड़ी ने किसी भी कारण से होने वाली मौत के समय की सटीक भविष्यवाणी की। खास बात यह है कि जब किसी जीव को विकिरण या पुरानी बीमारी का सामना करना पड़ा, तो घड़ी की रफ्तार तेज हो गई- यानी उसकी जैविक उम्र तेजी से बढ़ने लगी। वहीं, उम्र रोकने वाले उपचार मिलने पर घड़ी धीमी हो गई। ब्रिटेन की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के जीवविज्ञानी जोआओ पेड्रो डी मैगलहेस कहते हैं,‘चूहों पर उम्र से जुड़े प्रयोग करने में वर्षों लगते हैं। लेकिन यदि हमारे पास ऐसी घड़ी हो जो तुरंत बता दे कि कोई इलाज काम कर रहा है या नहीं, तो यह विज्ञान के लिए बेहद फायदेमंद होगा।’
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