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टाटा संस को लिस्टिंग से बचाएगा दो कंपनियों का मर्जर: 80 साल पुराने मॉडल पर लौटेगा ग्रुप, RBI के नियमों से छूट मिलेगी

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टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट होने से बचाने के टाटा ट्रस्ट ने एक नया प्लान बनाया है। RBI के नियमों के अनुसार, टाटा संस जैसी बड़ी वित्तीय निवेश कंपनियां ‘अपर-लेयर NBFC’ की कैटेगरी में आती हैं, जिसके तहत उन्हें कानूनन शेयर बाजार में लिस्ट होना जरूरी है। इस प्लान के तहत टाटा की दो अलग कंपनियों- टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स का टाटा संस के साथ मर्जर किया जाएगा। मर्जर के बाद टाटा संस एक वित्तीय निवेश कंपनी के बजाया ऐसी कंपनी बन जाएगी जो खुद भी सेवाएं या सामान बनाती और बेचती है। ऐसा करने से टाटा संस RBI के कड़े नियमों के दायरे से बाहर हो जाएगी। जब कंपनी दायरे से बाहर हो जाएगी, तो उस पर शेयर बाजार में लिस्ट होने का कानूनी दबाव भी खत्म हो जाएगा और टाटा समूह अपनी होल्डिंग कंपनी का नियंत्रण पूरी तरह अपने पास बनाए रख सकेगा। अपने 100 साल के सफर में 80 साल तक टाटा संस ने इसी तरह खुद का बिजनेस चलाया है। उदाहरण के लिए, 2004 तक TCS कोई अलग कंपनी नहीं, बल्कि टाटा संस का ही एक हिस्सा था। इस नए मर्जर से टाटा संस एक बार फिर अपने इसी पुराने कारोबारी मॉडल पर लौट आएगी। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी यानी मालिकाना हक है। ऐसे में टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस के बोर्ड को एक पत्र भेजकर इस मर्जर प्लान को मंजूरी मांगी है। साथ ही, उन्होंने RBI से इस मर्जर के लिए NOC और जरूरी इजाजत मांगने के लिए आवेदन करने को कहा है। इसके लिए टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस मिलकर RBI से चर्चा करेंगे। टाटा संस की अर्जी खारिज कर चुका है RBI इस महीने की शुरुआत में RBI ने टाटा संस का वह आवेदन खारिज कर दिया था, जिसमें उसने खुद को इन्वेस्टमेंट कंपनी की कैटेगरी से बाहर करने की मांग की थी। RBI के नियमों के मुताबिक, टाटा संस जैसी बड़ी फाइनेंशियल कंपनियों के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है। 64% कमाई ऑपरेटिंग बिजनेस से होगी टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, मर्जर के बाद मार्च 2026 तक नई टाटा संस की कुल कमाई में से लगभग 64.3% (करीब ₹1.05 लाख करोड़) हिस्सा सीधे सामान या सर्विसेज बेचने से आएगा। वहीं, निवेश और फाइनेंशियल सोर्स से सिर्फ 35.7% (करीब ₹40,072 करोड़) की कमाई होगी। RBI के नियमों के अनुसार, किसी कंपनी को NBFC या इन्वेस्टमेंट कंपनी तभी माना जाता है जब उसकी कुल कमाई का बड़ा हिस्सा निवेश या वित्तीय लेन-देन से आता हो। टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि इस मर्जर के बाद टाटा संस की मुख्य कमाई सीधे बिजनेस करने से होगी, जिससे यह अपने आप RBI के NBFC वाले पैमाने से बाहर हो जाएगी और इस पर शेयर बाजार में लिस्ट होने के कड़े नियम लागू नहीं होंगे। RBI की NOC और रजिस्ट्रेशन सरेंडर करना होगा जरूरी इस प्लान को लागू करने के लिए रिजर्व बैंक की मंजूरी जरूरी है। चुकी दो चलती-फिरती कंपनियों को एक NBFC में मिलाया जा रहा है, इसलिए टाटा संस को RBI से NOC लेनी होगी। मर्जर की प्रक्रिया पूरी होने और इन्वेस्टमेंट कंपनी का दर्जा खत्म होने के बाद टाटा संस को अपना NBFC रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर करना होगा। ट्रस्ट्स का मानना है कि कानून के दायरे में किया जा रहा यह बदलाव ग्रुप के स्ट्रक्चर को सुरक्षित रखेगा और समाज सेवा के कामों को बिना रुकावट जारी रखेगा। टाटा संस को प्राइवेट रखने पर एकमत थे ट्रस्ट्स टाटा ट्रस्ट्स के मुताबिक, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड ने जुलाई 2025 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर टाटा संस को प्राइवेट (नॉन-लिस्टेड) रखने का फैसला लिया था। ट्रस्ट्स का मानना है कि इस बदलाव से ग्रुप का 100 साल पुराना स्ट्रक्चर सुरक्षित रहेगा। कंपनी बिना किसी बाहरी दबाव के लंबे समय के लक्ष्यों और समज सेवा पर पर ध्यान दे सकेगी। क्या होती है CIC और क्यों लिस्टिंग से बचना चाहती है टाटा संस?



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