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4 घंटे पहले
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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक
किसी भी क्षेत्र में चैम्पियन तो बना जा सकता है, पर रोल मॉडल बने रहना तभी संभव है, जब समय आपका आकलन जीवन-मूल्यों से करे। क्या आप भी इस बात से राजी नहीं हैं कि एक रोल मॉडल बनने का अर्थ परिवार की ओर मुड़कर फिर से अपने जीवन-मूल्यों को याद करना और संभाले रहना होता है?
इस बात को थोड़ा और समझने के लिए हमें मिरका फेडरर के उस भाषण से गुजरना होगा, जो उन्होंने 29 अगस्त 2026 को हॉल ऑफ फेम में आधिकारिक रूप से शामिल होने के लिए अपने पति, टेनिस के दिग्गज रोजर फेडरर का परिचय देने के लिए मंच संभालते हुए दिया था।
मिरका ने कहा…, मेरा यकीन मानिए, मैंने उनकी मेहनत, उनकी घंटों की प्रैक्टिस, उनका अनुशासन और समर्पण देखा है। मैंने वह सब देखा है, जिससे यह सब इतना आसान लगता है। और उनके हजार से ज्यादा मैच देखने के बाद भी मैं हमेशा हैरान रह जाती थी। लेकिन इसके पीछे का इंसान और भी कमाल का है। …उनके माता-पिता उन्हें एक प्यारे बेटे के तौर पर जानते हैं।
उनकी बहन उन्हें एक बेहतरीन भाई मानती है। और उनके दोस्त उन्हें ऐसे इंसान के तौर पर जानते हैं, जिनके पास हमेशा उनके लिए समय होता है, चाहे उनकी जिंदगी कितनी भी व्यस्त क्यों न हो जाए। और ये खूबियां अचानक नहीं आईं। उन्होंने ये बातें अपने माता-पिता से सीखीं। उन्होंने उन्हें विनम्रता, आभार और दयालुता सिखाई। और उन्होंने उन्हें सिखाया कि सबके साथ एक जैसा सम्मानजनक व्यवहार करें।
आगे उन्होंने कहा, दुनिया रोजर फेडरर को जानती, उससे बहुत पहले ही, रॉबी और लिने (रोजर के पैरेंट्स) ने मुझे एक ऐसा इंसान दिया, जिसकी मैं और भी ज्यादा तारीफ करती हूं : मेरा साथी रोजर, दोस्त रोजर और आखिर में एक पति और पिता रोजर।
जिस दौर में सबकुछ टूट रहा हो, इंसानियत या इंसान बने रहने का भाव अनावश्यक और कुछ बोझिल-सा महसूस हो रहा हो, जहां परिवार में सभी के साथ रहना और माता-पिता को सुनना-समझना कठिन होता जा रहा हो, जहां दाम्पत्य जीवन और पैरेंटिंग के नित-नए सूत्र ढूंढे जा रहे हों, वहां स्विट्जरलैंड के हीरो रोजर फेडरर के परिवार की जड़ों को अटूट देखना बहुत सुखद लगता है और इससे यह विश्वास भी प्रबल होता है कि वास्तविक चैम्पियन सबसे पहले और आखिर तक एक बहुत अच्छा इंसान ही होता है।
वहीं, रोजर फेडरर भी मानते हैं कि अगर मिरका न होतीं तो वे इतने बेफिक्र होकर लंबे समय तक टेनिस नहीं खेल पाते। रोजर से रोजर फेडरर बनने में भी उनके परिवार की ही सबसे बड़ी भूमिका रही। जब वे जूनियर खिलाड़ी के तौर पर गुस्सा करते थे या रैकेट फेंकते थे, तब भी उनके माता-पिता उन्हें शांत रहकर खेल का सम्मान करना सिखाते थे। उनके शब्दों में, आज मैं जो कुछ भी हूं, अपने माता-पिता के बिना शर्त प्यार और समर्थन की वजह से हूं।
टेनिस में रोजर फेडरर की ही तरह क्रिकेट की दुनिया की किंवदंती सचिन तेंदुलकर ने भी हाल ही में शिक्षक दिवस के अवसर अपने पिता को याद करते हुए एक फेलोशिप की घोषणा की और इस अवसर पर बहुत कुछ कह गए।
उनके पिता उन्हें हमेशा याद दिलाते थे कि असफलता ठीक है, लेकिन शॉर्टकट ठीक नहीं। खेल में या कहीं भी धोखा देना ठीक नहीं है। लोग उनके शतकों को भूल जाएंगे, लेकिन वे कितने अच्छे इंसान रहे और समाज के लिए क्या किया, यह याद रखा जाएगा।
यानी रोजर हों या सचिन, चैम्पियंस तभी वास्तविक चैम्पियन और रोल मॉडल बनते हैं, जब वे अपने परिवार में भी इंसानियत के चैम्पियन हों। इसलिए जहां दुनिया उनको चैम्पियन और रोल मॉडल के रूप में याद करती है, वहीं वे परिवार द्वारा सिखाए जीवन-मूल्यों को नहीं भूलते।
और यह न भूलिए कि सफलता और शोहरत जब सिर चढ़कर बोलती है तो कृतज्ञता, सादगी, विनम्रता और अच्छाइयों को अपने व्यवहार में संभाले रखना आसान नहीं होता। लगातार अच्छा इंसान बने रहना ही सही मायनों में चैम्पियन माइंडसेट होता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)







