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एक युवती सोशल मीडिया पर रोज अपनी नाकामी पोस्ट कर रही है। लक्ष्य है- एक हजार बार खारिज होने का रिकॉर्ड बनाना। वैंकूवर में टूटे रिश्तों, छूटी नौकरियों और अधूरे सपनों की निशानियों से भरा एक म्यूजियम खुला है। वहीं, फ्रांस के एक बड़े अखबार ने ‘नाकामी जिंदाबाद’ शीर्षक से सीरीज शुरू की है। इनके पीछे सोच यही है कि बार-बार और सबके सामने नाकाम होने से उसकी चुभन और शर्म धीरे-धीरे कम हो जाती है। ये देख लगता है- दुनिया कितनी बदल गई। लोग हार भी खुलकर स्वीकार करने लगे हैं। पर, क्या ये सच में सकारात्मक बदलाव है या उस पीढ़ी की बेचैनी है, जिसके पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा? जेन-एक्स दिखाते थे- यूं ही सफल हुए 90 के दशक में पली-बढ़ी जेन-एक्स पीढ़ी महत्वाकांक्षा को छिपाती थी। तब ‘कूल’ होने का अर्थ था- ये दिखाना कि सफलता बिना किसी खास तैयारी के अपने-आप मिल गई। न कोई संघर्ष किया न पसीना बहाया। हालांकि, ये शांति कुछ-कुछ बतख जैसी होती थी, जो ऊपर से भले स्थिर दिखे लेकिन पानी के भीतर पैर चप्पू की तरह चलते थे। ये पीढ़ी अपने सपने और मेहनत इतनी सफाई से छिपाती थी कि संघर्ष से जूझने वाले सोचने लगते कि शायद मैं ही कमजोर हूं। पर, ये ईमानदारी नहीं, एक सामूहिक दिखावा था। अब मेहनत ही कूल है आज युवा पीढ़ी खुलकर कह रही है कि वह बड़े सपने देखती है और उनके लिए मेहनत करेगी। अब मेहनत करना कूल है। ग्रैमी अवॉर्ड्स में संगीतकार फैरेल विलियम्स ने लोगों से कहा, ‘मेहनत कभी मत छोड़ो, बस काम करते रहो।’ द टाइम्स ने हाल में बताया कि ‘जी-तोड़ कोशिश और उसके बारे में खुलकर बात’ अब चलन में है। इसकी मिसाल हैं अभिनेता तिमोथे शालामे, जिन्होंने पिछले साल महानता की तलाश का ऐलान करते हुए कहा कि वे सिनेमा के लिए पूरी तरह समर्पित हैं। यानी एक बार फिर हमें बड़े सपनों की कीमत पसीने से चुकानी है। मेहनत छिपाने का वह पुराना चलन असल में उनके साथ अन्याय था, जिन्हें दरवाजे बंद मिलते थे। वे सोचते थे कि बाकी को सब इतनी आसानी से मिल गया तो मुझे क्यों नहीं? अब कम से कम पारदर्शिता है। ये सशक्तीकरण है या मजबूरी असल सवाल ये है कि ये सशक्तीकरण है या मजबूरी? आज के युवा एक दशक के सबसे बुरे रोजगार बाजार में खड़े हैं। सोशल मोबिलिटी फाउंडेशन के एलन मिलबर्न इसे ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, तीनों स्तरों पर त्रासदी’ कह चुके हैं। ऐसे में युवा क्या करें? यही कि नाकामी को सफलता की यात्रा का हिस्सा बताएं। खुद को बेहतर बनाते रहें और इस सामूहिक उलझन से निकलने की कोशिश करते रहें। असफलता को सेलिब्रेट करना साहस है। लेकिन, जब कोई सिर्फ इसलिए नाकामी का जश्न मनाए, क्योंकि उसके पास कोई सुरक्षा घेरा नहीं है, कोई समुदाय नहीं जो थाम ले, कोई व्यवस्था नहीं जिस पर भरोसा हो तो यह जश्न नहीं, एक दर्दभरी पुकार है। म्यूजियम में रखी वे निशानियां, सोशल मीडिया पर गिने जाते रिजेक्शन लेटर्स, नाकामी जिंदाबाद के नारे… ये सब किसी टूटे हुए इंसान की कहानी नहीं हैं। 16 से 24 साल के युवा भविष्य को लेकर 5 गुना ज्यादा डरे हुए फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, आर्थिक-सामाजिक रूप से निष्क्रिय युवा एक दशक में दोगुने हो गए। स्ट्रैटजी एजेंसी स्टार्लिंग के अनुसार, 16 से 24 साल के युवा, 12 से 15 साल के बच्चों की तुलना में भविष्य से 5 गुना ज्यादा डरे हुए हैं। उनके मन में एक शब्द घर कर गया है- ‘भविष्यहीनता’। वे सोचते हैं कि घर, नौकरी, परिवार, पढ़ाई जैसी जो चीजें उनके माता-पिता की पीढ़ी को बिना सोचे मिल जाती थीं, वे उनकी पहुंच से दूर होती जा रही हैं।
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