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नोट्स एप, सोशल मीडिया की चकाचौंध से दूर खूबसूरत कोना: अमेरिकी लेखिका का अनुभव- फोन के 1700 अधूरे नोट्स में छिपा है निखरने का जरिया

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द न्यूयॉर्क टाइम्स. न्यूयॉर्क2 घंटे पहले

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मनोवैज्ञानिक जूलिया सोआरेस कहती हैं,‘डिजिटल उपकरण हमारी स्मृतियों को संजोने और उन्हें याद रखने में मदद करने वाले ‘साझेदार’ बन गए हैं।-प्रतीकात्मक फोटो - Dainik Bhaskar

मनोवैज्ञानिक जूलिया सोआरेस कहती हैं,‘डिजिटल उपकरण हमारी स्मृतियों को संजोने और उन्हें याद रखने में मदद करने वाले ‘साझेदार’ बन गए हैं।-प्रतीकात्मक फोटो

‘आपके फोन का सबसे पुराना नोट कौन सा है?’ मेरी छोटी बहन ने मुझसे यह सवाल इस अंदाज में पूछा, जैसे कोई बड़ा राज पूछ रही हो। उसने बताया कि आजकल वह ‘नोट्स एप’ को किसी निजी मैगजीन की तरह पढ़ती है… ऐसा ‘डाइजेस्ट’ जहां इंसान के सबसे गहरे विचार और बेतुकी बातें साथ दर्ज होती हैं।’

लेखिका रेनफोर्ड स्टाफर कहती हैं, बहन की बात सुनकर मैंने तुरंत फोन निकाला और नोट्स एप खोला। यह एप मेरे दिमाग का सबसे सटीक नक्शा है, जहां सब कुछ थोड़ा बिखरा हुआ और यादों से जुड़ा रहता है। यहां पर बनी लिस्ट मेरे रोजमर्रा के काम संभालती हैं, पर साथ ही दोस्तों के जन्मदिन, राशन की लिस्ट और कुछ अजीब शब्द सब साथ तैरते रहते हैं।’ रेनफोर्ड बताती हैं,‘स्क्रॉल करते हुए मुझे एहसास हुआ कि सोशल मीडिया जैसी सजी-संवरी डिजिटल दुनिया में नोट्स एप ही हमारी असली, अनफिल्टर्ड पहचान को संजोता है। यहां लाइक, कमेंट या दिखावे की जगह नहीं होती। यही वह स्थान है जहां हमारे सबसे अजीब, उदास और प्यारे विचार सुरक्षित रहते हैं।

रेनफोर्ड कहती हैं,‘नोट्स एप ऐसा ‘डिजिटल टाइम कैप्सूल’ है जो अतीत के पन्ने एक-एक करके खोलने लगता है। अंगूठा जैसे-जैसे स्क्रीन पर नीचे पहुंचता है, वक्त की परतें हटने लगती हैं। 2017 का नोट सामने आता है; उसमें मेरी बिल्ली के खर्राटे की रिकॉर्डिंग सहेजी हुई थी।

फिर 2019 का वो नोट मिलता है, जहां पहली किताब के इंटरव्यू के सवाल मैंने बेहद हड़बड़ाहट में लिखे थे… पर हर पन्ना खुशगवार नहीं होता। 2022 के नोट पर उंगलियां ठिठक जाती हैं। उसमें टूटे हुए रिश्ते की हताशा थी, अपना सामान वापस मांगने के लिए दस मैसेज के ड्राफ्ट्स थे… हर शब्द में झिझक, दर्द व उदासी थी। इन 1,781 अधूरे विचारों, मसौदों, यादों व अपने ही पुराने रूपों के बीच स्क्रॉल करते हुए मैं मुस्कुराई। कितना बिखराव है, कितनी अव्यवस्था है। पर यही तो इसकी खूबसूरती है। यह मेरी असली, अनगढ़ व ईमानदार कहानी है। यह उन पलों का संग्रह है जिन्हें मैं शायद भूल चुकी होती। यह मेरी जिंदगी का निजी इतिहास है, जो बिना दिखावे के मेरे साथ चलता रहा है।’

छोटी-छोटी डिजिटल नि​शानियां सबसे सार्थक दस्तावेज – एक्सपर्ट

मनोवैज्ञानिक जूलिया सोआरेस कहती हैं,‘डिजिटल उपकरण हमारी स्मृतियों को संजोने और उन्हें याद रखने में मदद करने वाले ‘साझेदार’ बन गए हैं। अक्सर हम सोचते हैं कि पुराने वॉइसमेल, ईमेल या नोट्स महत्वहीन हैं, पर समय बीतने पर वही छोटी-छोटी डिजिटल निशानियां हमारी जिंदगी के सबसे भावनात्मक व अर्थपूर्ण दस्तावेज साबित होती हैं। न्यूयॉर्क के छात्र एंडी को लगता था कि वे अंतिम वक्त में मां के लिए कुछ नहीं कर पाए। पर जब उन्होंने उन दिनों के नोट्स दोबारा पढ़े, तो महसूस हुआ कि वे पूरी निष्ठा से उनकी देखभाल कर रहे थे। वहीं ट्रेनर नादिया के लिए 2016 में लिखा गया पहला नोट, छोटी कविता, बीते 8 वर्षों में आए बदलाव का जीवंत दस्तावेज बन गया।



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