पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  भीड़ बाहर की हो या भीतर की, इसे संयमित रखिए
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: भीड़ बाहर की हो या भीतर की, इसे संयमित रखिए

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भीड़ बढ़ती ही जा रही है। केवल मनुष्यों ही नहीं, बेहिसाब डेटा और सूचनाओं की भी भीड़ बाढ़ की तरह हमारे जीवन में उतर गई है। और इसी कारण किसी भी बात की सच्चाई का पता नहीं लगता। भीड़ में सूचनाओं की सच्चाई कहीं खो गई। भीड़ के कारण आयोजनों के पीछे का सही उद्देश्य कहीं भटक गया। कभी-कभी तो लगता है संसार में भीड़ के अलावा कुछ है ही नहीं। संसार को शास्त्रों में सागर कहा गया है। सागर के एक किनारे पर खड़े हो जाओ तो दूसरा किनारा दिखता नहीं है। एक लहर दिखती है, फिर वो खो जाती है, फिर दूसरी आ जाती है। सागर आकर्षक लगता है, लेकिन उसे पिया नहीं जा सकता। ठीक ऐसा ही भीड़ भरा संसार है। भीड़ की ये मानसिकता धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरने लगती है। उसका एक प्रभाव यह होता है कि हमारे अंदर विचारों की भीड़ पैदा हो जाती है। और विचारों की भीड़ मनुष्य को अशांत करती है, असंतुलित कर देती है। तो भीड़ बाहर की हो या भीतर की, इसे संयमित रखिए, क्योंकि भीड़ के पास भाव नहीं होता- सिर्फ शोर रहता है।



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