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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: हमारी मातृभाषा का एक रूप सात समंदर पार भी बना हुआ है

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3 घंटे पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

तेजी से बदलती दुनिया में विवाह-संस्कार के नए-नए रूप देख अच्छा तो लगता है, पर चिंता भी की जानी चाहिए। पिछले दिनों अमेरिका के सेंट लुइस शहर में एक विवाह समारोह में भाग लेने का अवसर मिला। आयोजक ने भव्यता में कोई कमी नहीं छोड़ी, पर संस्कार बचाने के प्रयास भी किए जा रहे थे।

अमेरिका में हो रहे समारोह में भारतीय संस्कार बचाए जाएं, यह इस बात का आश्वासन था कि हम ऋषि-मुनियों की परंपरा को नहीं भूले हैं। पर एक बात चौंकाने वाली लगी। जो युवा वहां नाच-गाने में मशगूल थे, उनमें से अधिकांश ठीक-से हिंदी नहीं बोल सकते। लेकिन हिंदी सिनेमा के गीतों के प्रति उनकी जानकारी व लगाव देखकर हिंदी को मैंने प्रणाम किया।

उन्हें भले ही कई शब्दों के अर्थ नहीं मालूम, पर हिंदी के बोल उनकी रग-रग में उतरे थे और उसी उत्साह में वे नृत्य कर रहे थे। हमने अभी-अभी हिंदी दिवस मनाया है। मेरे मन में हमारी मातृभाषा को प्रणाम करने का मन हुआ कि आपका यह रूप भी सात समंदर पार बना हुआ है।

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