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अक्सर लोग मानते हैं कि दिल की बीमारी बुढ़ापे की समस्या है। लेकिन नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी का नया शोध हैरान करने वाला है। इसके अनुसार, पुरुषों के लिए 35 की उम्र से ही दिल का खतरा बढ़ने लगता है। यह वह दौर है जब पुरुष अपने करियर को मजबूत दिशा दे रहा होता है और ठीक इसी समय उसके शरीर के भीतर ‘कोरोनरी आर्टरी डिजीज’ (धमनियों में ब्लॉकेज) खामोशी से दस्तक दे रही होती है। इसी खतरे को देखते हुए अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने नई 2026 गाइडलाइन्स में अब 19 साल की उम्र से ही कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग शुरू करने की सलाह दी है।
शोध के मुताबिक, 35 की उम्र के बाद पुरुषों में अगले 10 वर्षों तक हृदय रोग यानी कार्डियोवस्कुलर डिजीज (सीवीडी) का खतरा महिलाओं से लगभग दोगुना हो जाता है। यह जोखिम तब भी बना रहता है, जब धूम्रपान या डायबिटीज न हो। इस दौरान धमनियों में चर्बी और कोलेस्ट्रॉल की परत (प्लाक) धीरे-धीरे जमती रहती है। इस दौरान इसके कोई लक्षण भी समझ नहीं आते। रिपोर्ट के मुताबिक तनाव, खराब नींद और अकेलापन मध्यम उम्र में भी दिल को प्रभावित करते हैं। युवावस्था में लोग अक्सर इन शुरुआती संकेतों को दबा देते हैं। एक्सपर्ट के मुताबिक ये आगे चलकर गंभीर समस्या बन सकते हैं। 50 की उम्र 4.7% पुरुषों में हार्ट अटैक का जोखिम, महिलाओं में 57 तक 2.9% दिल की देखभाल 40 की उम्र के बाद तक टालना जोखिम भरा हो सकता है। शोध के अनुसार, 50 साल तक 4.7% पुरुषों में हृदय संबंधी बीमारी (कार्डियोवस्कुलर डीसीज) विकसित हो जाती है, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 2.9% है और वे 57 साल तक इस स्तर पर पहुंचती हैं। भारतीयों में यह खतरा पश्चिमी देशों से करीब 10 साल पहले दिखता है। दुबले दिखने के बावजूद इंसुलिन रेजिस्टेंस और पेट की चर्बी ‘बुरे कोलेस्ट्रॉल’ को बढ़ाती है। इसलिए 30 की उम्र से स्क्रीनिंग, संतुलित आहार, अच्छी नींद, कम तनाव और रोज 30 मिनट तेज चलना दिल को लंबे समय तक सुरक्षित रख सकता है।
शरीर में लिपोप्रोटीन-ए का स्तर अधिक होने से अचानक हार्ट अटैक की आशंका डॉक्टरों का मानना है कि स्वस्थ दिल के लिए सेहतमंद खाना और व्यायाम ही काफी नहीं है। कई बार ये बीमारी हमारे जीन में मिलती है। कुछ लोगों के शरीर में जन्म से ही लिपोप्रोटीन-ए (खून में जमा होने वाली एक खास तरह की चिपचिपी चर्बी) का स्तर ज्यादा होता है। यह फिट दिखने वाले युवाओं को भी अचानक हार्ट अटैक दे सकती है। शोध कहता है कि अकेलापन और उदासी सीधे दिल की धड़कन और उसकी काम करने की क्षमता पर बुरा असर डालते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर के साथ-साथ मन का सुकून भी उतना ही जरूरी है। यही वजह है कि 19 की उम्र पार करते ही रेगुलर हार्ट स्क्रीनिंग जरूरी बनते जा रहा है।
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