‘ट्रॉफी वाइफ’ का ट्रेंड थमा:  खुद से आधी उम्र वाली के बजाय हमउम्र पत्नी तलाश रहे अमीर; अब बौद्धिक समानता और पेशेवर तालमेल अहम
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‘ट्रॉफी वाइफ’ का ट्रेंड थमा: खुद से आधी उम्र वाली के बजाय हमउम्र पत्नी तलाश रहे अमीर; अब बौद्धिक समानता और पेशेवर तालमेल अहम

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पुराने दौर की हॉलीवुड फिल्में हों या मशहूर उपन्यास, एक सीन अक्सर कॉमन होता था- सफेद बालों वाला बेहद अमीर बिजनेसमैन, जो अपने बगल में खुद से आधी उम्र की बेहद खूबसूरत जीवनसाथी का हाथ थामे किसी पार्टी में एंट्री करता है। समाज में इसे ‘ट्रॉफी वाइफ’ का नाम दिया गया। तब ऐसा माना जाता था कि जैसे-जैसे आदमी की तिजोरी भरती है, उसकी पत्नी की उम्र घटती जाती है। पर, हालिया आंकड़ों ने इस फिल्मी कहानी को पूरी तरह पलट कर रख दिया है। अमेरिका के सबसे अमीर जोड़ों पर किए गए नए विश्लेषण से पता चला है कि अब रईस दंपतियों में उम्र का फासला तेजी से सिकुड़ रहा है। 2013 की एक स्टडी पर गौर करें, तो उस समय ‘फोर्ब्स 400’ की लिस्ट में शामिल दुनिया के सबसे अमीर पुरुषों और उनकी पत्नियों के बीच औसतन 7 साल का अंतर था। आम लोगों में यह अंतर महज 2-3 साल का होता था। हाल के वर्षों में यह फर्क घटा और 2024 तक सबसे अमीर और औसत समूह में 10 साल या उससे ज्यादा का अंतर लगभग समान हो गया। अब अलग उम्र वाले साथी से शादी की संभावना सबसे ज्यादा निम्न आय वर्ग में दिखती है। आय पैमाने के निचले सिरे पर करीब 8% पुरुष, पत्नी से कम से कम 10 साल बड़े हैं, जबकि मध्यम आय वर्ग में यह अनुपात करीब 5% है। चौंकाने वाली बात यह थी कि अगर ये रईस दूसरी शादी करते थे, तो नई पत्नी उनसे औसतन 22 साल छोटी होती थी। तब इसे कामयाबी की निशानी माना जाता था। अक्सर चर्चा होती है कि पुरुष छोटी उम्र की पत्नी चुनते हैं, तो सफल महिलाएं भी छोटे उम्र के ‘ट्रॉफी हसबैंड’ खोजती होंगी। पर आंकड़े इसे खारिज करते हैं। जैसे-जैसे महिलाओं की कमाई बढ़ी है, वे छोटी उम्र के बजाय हमउम्र जीवनसाथी को अहमियत दे रही हैं। अमीर महिलाओं में उम्र के बड़े फासले वाली शादियां उतनी ही कम हैं, जितनी कम आय वाली महिलाओं में। 1980 में टॉप 1% कमाई वाले पतियों में हर 12 में 1 की प|ी उनसे कम से कम 10 साल छोटी थी, जबकि पूरे सैंपल में यह अनुपात हर 17 में 1 था। यानी अमीर वर्ग में उम्र का बड़ा अंतर ज्यादा दिखता था। इस बदलाव की वजह पैसा नहीं, बेहतर शिक्षा: एक्सपर्ट नीदरलैंड्स की ग्रोनिंगन यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री गेर्टन ल्यूक कहते हैं, इस बदलाव का कारण ‘पैसा’ नहीं, बल्कि ‘शिक्षा’ है। ज्यादा कमाने वाले लोग जिंदगी का बड़ा हिस्सा कॉलेज, यूनिवर्सिटी व प्रोफेशनल कोर्स में बिताते हैं। इस दौरान उनका सामाजिक दायरा उनके क्लासमेट्स का होता है। वे उन्हीं के साथ काम करते हैं, वक्त बिताते हैं, उन्हीं में से जीवनसाथी चुनते हैं। मिनेसोटा पॉपुलेशन सेंटर के अनुसार सफल लोग साथी चुनते समय ‘ग्लैमर’ नहीं, बल्कि बौद्धिक समानता व प्रोफेशनल तालमेल को महत्व देते हैं। इसी वजह से ‘पावर कपल्स’ अब समान उम्र के दिखते हैं।



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