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व्यक्ति के सामने हर दिन नई चुनौतियां सिर उठा रही हैं। ऐसे में अमूमन लोग तनाव में आकर या तो आक्रामक हो जाते हैं या फिर पूरी तरह टूट जाते हैं। ऐसे माहौल में सिर्फ मेहनत काफी नहीं। चुनौतियों का असरदार तरीके से सामना करने के लिए एक मानसिक क्षमता जरूरी है। येल स्कूल ऑफ मेडिसिन की ट्रॉमा साइकोलॉजिस्ट प्रोफेसर जॉन एम. कुक की ताजा रिसर्च कहती है कि आज के बदलते दौर में अगर आपको दिमागी और शारीरिक रूप से फिट रहना है, तो खुद को ‘लोहे जैसा कड़क’ नहीं, बल्कि ‘पानी जैसा लचीला’ बनाना होगा। विज्ञान की भाषा में इसे ‘साइकोलॉजिकल फ्लेक्सिबिलिटी’ यानी मानसिक लचीलापन कहते हैं। शोध के अनुसार, जो लोग हालात के हिसाब से अपनी सोच को मोड़ने की ताकत रखते हैं, वे डिप्रेशन और एंग्जाइटी (घबराहट) के शिकार नहीं होते। मतलब, तनाव के समय सोचने, महसूस करने और प्रतिक्रिया देने के तरीके में फुर्ती से बदलाव कर पाना। मानसिक लचीलापन क्या है और क्यों जरूरी है इसका मतलब है कि व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार में जरूरत के हिसाब से बदलाव कर सके। तनाव आए तो दिमाग एक ही ढर्रे पर न अटक जाए। साइकोलॉजिस्ट प्रो. जॉन एम. कुक के अनुसार, ‘यह हमारे सोचने, महसूस करने और तनाव से उबरने की वह काबिलियत है, जो हमें मुश्किल वक्त में भी टूटने नहीं देती।’ इसका मतलब यह है कि जब भी दिमाग में कोई गलत विचार या उदासी आए, तो उससे लड़ने या जबरन बदलने की बजाय, उसे स्वीकार करें। शांत रहकर अगला कदम उठाएं। साइकोलॉजिस्ट साइमन रेगो के मुताबिक मानसिक लचीलापन शारीरिक लचीलेपन जैसा है। इसे विकसित किया जा सकता है। विशेषज्ञों की राय- जितने कड़े होंगे, उतना ही ज्यादा भुगतेंगे मॉन्टेफियोर मेडिकल सेंटर के चीफ साइकोलॉजिस्ट साइमन रेगो का कहना है कि मानसिक लचीलापन ठीक वैसा ही है, जैसे शरीर का लचीलापन। वे कहते हैं, ‘जब हम इस बात पर अड़ जाते हैं कि जिंदगी को सिर्फ एक ही ढर्रे पर चलना चाहिए या हमारी बात ही सही है, तो हमारी तकलीफें कई गुना बढ़ जाती हैं। जो लोग परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं, वे हर संकट से पार पा जाते हैं।’ प्रोफेसर कुक अक्सर अपने मरीजों को अमेरिकी उद्योगपति हेनरी फोर्ड की एक बात याद दिलाती हैं, ‘अगर आप हमेशा वही करते रहेंगे, जो करते आए हैं, तो आपको आगे भी वही मिलेगा जो आज तक मिलता आया है।’ इसलिए अपनी पुरानी आदतों और ढर्रे को बदलना जरूरी है।
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