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बिजनेस स्कूल नहीं, टीमों के ड्रेसिंग रूम से मैनेजमेंट सबक: नेतृत्व, दबाव और स्टार टैलेंट संभालना सिखा रहीं स्पोर्ट्स डॉक्यूमेंट्री

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बिजनेस स्कूल लंबे समय से मैनेजमेंट विचारों का बड़ा ठिकाना रहे हैं। लेकिन, आज उनके पास बड़े और नए विचारों की कमी दिखती है। दूसरी तरफ, खेल टीमों के ड्रेसिंग रूम नेतृत्व, संघर्ष और रणनीति के सबक से भरे हैं। फॉर्मूला-1 टीमों पर बनी ‘ड्राइव टू सर्वाइव’ और शिकागो बुल्स के 1997-98 सीजन पर बनी ‘द लास्ट डांस’ सफल रहीं। इनसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स समझ गए कि दर्शक सिर्फ मैच के नतीजे नहीं चाहते। मैदान किनारे बनने वाली रणनीति और फैसलों की सोच समझना चाहते हैं। अमेजन और नेटफ्लिक्स की स्पोर्ट्स डॉक्यूमेंट्रीज में मैनेजमेंट के ऐसे तमाम ‘क्रैश कोर्स’ भरे हैं। फुटबॉल डॉक्यूमेंट्री में पूरा एमबीए – टर्नअराउंड सीखना हो तो 2005 चैंपियंस लीग फाइनल में लिवरपूल की वापसी पर बनी फिल्म देखें। नॉर्वे की फुटबॉल टीम पर बनी ‘नॉर्वे: द डार्क हॉर्स’ नए बाजारों में विस्तार का पाठ देती है। ‘द बस: अ फ्रेंच फुटबॉल म्यूटिनी’ खराब कार्यस्थल का उदाहरण है। वहीं, ‘अ ब्यूटीफुल ऑब्सेशन’ दुर्लभ मैनेजमेंट केस-स्टडी जैसी है। इसमें मैनचेस्टर सिटी के मैनेजर जोसेप ‘पेप’ गार्डियोला का आखिरी सीजन दर्ज है। यह सिर्फ फुटबॉल की कहानी नहीं, बल्कि बड़ा संगठन चलाने की दुर्लभ अंदरूनी झलक है। गार्डियोला करीब एक अरब डॉलर सालाना आय वाला क्लब संभालते हैं, जहां हर हफ्ते नतीजों के आधार पर आकलन होता है। उन पर प्रशंसकों की उम्मीदों के साथ क्लब मालिकों की अपेक्षाएं पूरी करने का भी दबाव है। एक ही मैनेजर में कई भाव – गार्डियोला का नेतृत्व विरोधाभासों से भरा है। मैच से पहले वे खिलाड़ियों को गले लगाने को कहते हैं, हार के बाद शिकायत और फैसलों पर सवाल उठाने वालों को सख्ती से फटकारते हैं। कप्तान काइल वॉकर ‘साथ रहने’ की बात करते हैं, पर पहले एपिसोड के अंत तक टीम से बाहर हो जाते हैं। टचलाइन पर सामान्य समझ -प्रोफेशनल खेल शायद अब भी वाइटबोर्ड का आखिरी मजबूत किला है, जहां रणनीति, आंकड़ों और इंसानी आवेग का मेल दिखता है। गार्डियोला का ड्रेसिंग रूम ज्यादातर कॉरपोरेट बॉस को असहज लग सकता है। क्योंकि, यहां जीत की परवाह बाकी जगहों से ज्यादा है। जरूरी नहीं कि हर संस्था ऐसी हो। फिर भी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा ऐसी संस्थाओं से चलता है, जैसे एआई लैब और हेज फंड, जहां बहुत थोड़ी असाधारण प्रतिभाओं से अधिकतम काम लेना पड़ता है। खेल टीम… अमीरों की ट्रॉफी भी, कारोबार भी खेल टीमें असाधारण संस्थाएं हैं। अरबपतियों के लिए वे प्रतिष्ठा की सबसे बड़ी संपत्ति हैं, लेकिन कारोबार का ऐसा माध्यम भी हैं, जिसे कई लोग एआई के झटके से सुरक्षित मानते हैं। तर्क है कि फिल्मों और टीवी शो के उलट लाइव खेल एआई मॉडल बना नहीं सकते। दुनिया ऐसे दौर की ओर बढ़ सकती है, जहां बेरोजगारों के पास समय काटने के लिए बहुत कुछ नहीं होगा और उनका ध्यान, शायद उनकी पहचान भी, खेल टीमों के इर्द-गिर्द घूमेगी।



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