बोरिया मजुमदार का कॉलम:  फुटबॉल विश्वकप में नहीं होकर भी हम वहां मौजूद हैं
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बोरिया मजुमदार का कॉलम: फुटबॉल विश्वकप में नहीं होकर भी हम वहां मौजूद हैं

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फुटबॉल विश्व कप में भारतीय टीम भले ही नहीं खेल रही हो, लेकिन वालंटीयर्स से लेकर पत्रकारों तक, टूर्नामेंट में भारत की मौजूदगी है। नागपुर के 75 वर्षीय ओम मुंद्रा का ही उदाहरण लें। यह उनका सातवां विश्व कप है और वे न्यूयॉर्क में वालंटीयर के रूप में प्रशंसकों को इस प्रतिस्पर्धा के पूरे रोमांच का अनुभव करने में मदद कर रहे हैं। उनसे इस बारे में पूछें तो आपको एक जानी-पहचानी मुस्कान मिलेगी। वे कहेंगे, मुझे खेलों से प्यार है और मैं इस रोमांच का हिस्सा बनना चाहता हूं। ओम मुंद्रा अकेले नहीं हैं। ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने वर्षों तक केवल इसीलिए पैसे बचाए ताकि विश्वकप देखने अमेरिका पहुंच सकें। दो साल बचत करके विश्वकप देखने आने वाले एक दम्पती ने मुझसे कहा, यहां सब कुछ बहुत महंगा है। बेसिक ट्रांसपोर्ट और खाने-पीने के लिए भी मैच-डे का अनुभव लगभग 30,000 रु. का पड़ता है। फिर भी हम अधिक से अधिक मैच देखने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। देखें तो अमेरिका में इन तमाम भारतीयों की मौजूदगी अपने आप में एक कहानी है। यह हमारी सॉफ्ट-पावर का प्रमाण है। यह भारत का दुनिया तक पहुंचना है। अपनी टीम के वहां न होने के बावजूद, हमारे फैन्स और वॉलंटीयर्स ने विश्वकप में भारतीय रंग घोल दिया है।
यह केवल मीडिया और वालंटीयर्स तक सीमित नहीं है। अमेरिका में आप जहां भी नजर डालेंगे, भारतीय प्रभाव दिखेगा। आप किसी भी स्टेडियम में जाएं, आपको बहुत से लोग हिंदी या बांग्ला बोलते हुए सुनाई देंगे। वास्तव में, विश्वकप के लिए अमेरिका आए लोगों में भारतीय प्रशंसकों की हिस्सेदारी 2 से 3% तक है। कैन्सस सिटी में- जहां अर्जेंटीना का पहला मैच हुआ था और जिसमें लियोनेल मेसी ने हैट्रिक लगाई थी- वहां के बंगाली समुदाय ने महीनों पहले से योजना बनानी शुरू कर दी थी, ताकि वे मेसी को खेलते हुए देख सकें। वे फैन पार्कों में लगातार मौजूद रहते हैं और उनके लिए विश्व कप एक महीने तक चलने वाला ऐसा आयोजन है, जिसका वे भरपूर आनंद लेते हैं। वे सभी अपने पेशेवर जीवन में अच्छी तरह से स्थापित लोग हैं। वास्तव में, आप जिस भी खेल आयोजन में जाएंगे, वहां भारतीय प्रशंसकों को लेकर यही स्थिति दिखाई देगी। इस बार के विश्वकप में 48 टीमें शिरकत कर रही हैं। इनमें एशियाई टीमों की भी अच्छी भागीदारी है। ऐसे में हमें यह सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ प्रयास करने की आवश्यकता है कि आने वाले दशकों में फीफा विश्व कप में भाग लेने का भारत का सपना केवल एक असंभव कल्पना बनकर न रह जाए। भारत के फुटबॉल सिस्टम में पर्याप्त धन मौजूद है और हमें आशावादी तथा उम्मीद से भरे रहने की आवश्यकता है। हां, हमें राष्ट्रीय टीम के लिए अधिक अनुभव, अधिक मैच और मजबूत घरेलू ढांचे की जरूरत है, जो आगे चलकर आईएसएल को भी मजबूती दे। हमें अधिक सक्रिय एआईएफएफ की आवश्यकता है, जो भारत के फुटबॉल सिस्टम की वास्तविक और तात्कालिक समस्याओं को हल करने पर केंद्रित हो। और यहीं पर मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। मीडिया में अधिकांश लोग चार साल में एक बार जाग्रत होते हैं और पूछते हैं कि 130 करोड़ की आबादी वाला देश विश्वकप क्यों नहीं खेल रहा, जबकि 5 लाख की आबादी वाला केप वर्डे यूरोपीय चैंपियन स्पेन के खिलाफ एक अंक हासिल करने में सफल रहा। हालांकि यह एक आकर्षक सुर्खी जरूर बनती है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि इनमें से अधिकांश लोग विश्व कप समाप्त होते ही फिर गुम हो जाएंगे और 2030 में ही फिर दिखाई देंगे। हकीकत यह है कि 130 करोड़ में से 129.5 करोड़ लोगों को खेलों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। भारतीय खेलों को एक अधिक रचनात्मक और आत्मनिरीक्षण वाले दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो कमियों को पहचाने और आगे बढ़ने का रास्ता तय करे। यदि एआईएफएफ नेतृत्व कर सकता है, तो भारतीय फुटबॉल को आवश्यक गति देने के लिए पर्याप्त धन और जुनून मौजूद है। तब तक हम विश्व कप के लिए पैसे बचाते रहेंगे- कभी फैन्स तो कभी वालंटीयर्स के रूप में- और उम्मीद करते रहेंगे कि एक दिन हमें वैश्विक मंच पर भारत के लिए भी चीयर करने का मौका मिलेगा। अमेरिका में आप जहां भी नजर डालेंगे, भारतीय प्रभाव दिखेगा। आप किसी भी स्टेडियम में जाएं, आपको बहुत से लोग हिंदी या बांग्ला बोलते हुए सुनाई देंगे। वास्तव में, फीफा विश्वकप के लिए अमेरिका आए लोगों में भारतीय प्रशंसकों की हिस्सेदारी 2 से 3 प्रतिशत तक है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)



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