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- Shekhar Gupta Column | Is India Truly A Soft State? Analysis & Facts
7 घंटे पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’
क्या भारत एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ रहा है? क्या उसने अपने दुश्मनों को बहुत फायदा उठाने दिया? क्या हम बार-बार यह नहीं सोचते कि काश हम पटेल, नेताजी, सावरकर के रास्ते पर चले होते! कहा जाता है कि गांधीवादी घुट्टी को नेहरू की शांतिवादी विदेश नीति ने और बुरा रूप दे दिया।
लेकिन तथ्य और इतिहास इससे उलटी बात बताते हैं। भारत की जो आर्थिक और सैन्य सीमाएं हैं, उनके हिसाब से तो वह अपनी क्षमता से ज्यादा ही कर गुजरने में सफल रहा है। आधुनिक भारत की छवि पर गांधी की छाया भले रही हो, यह कभी गांधीवादी देश नहीं रहा।
वास्तव में, भारत ने जो पहली लड़ाई लड़ी, उसे गांधी का भी समर्थन हासिल था। गांधी ने आजादी के बाद दसवें सप्ताह में ही देश को यह पाठ पढ़ाया कि अगर लक्ष्य जायज है तो युद्ध जायज है। लायनेल प्रोतीप सेन (जो बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बने) 30 अक्टूबर 1947 को ‘डायरेक्टोरेट ऑफ मिलिट्री इंटेलिजेंस’ में कर्नल के पद पर आसीन थे।
कश्मीर में हालात बहुत नाजुक हो गए थे। महाराजा ने कश्मीर के विलय के दस्तावेज पर दस्तखत कर दिया था। भारतीय सेना को श्रीनगर की ओर कूच करने का आदेश दे दिया गया था, और वहां पहुंचते ही उसे झटका लगा था। 161 ब्रिगेड के कमांडर को गोली लगी और उन्हें हटा लिया गया। सेन को तरक्की देकर ब्रिगेडियर बनाया गया। उन्हें श्रीनगर के लिए रवाना होने से पहले राजनेताओं से भी परामर्श करने की सलाह दी गई।
वे सरदार पटेल से मिले, जिन्होंने उनको सलाह दी कि वे कश्मीर रवाना होने से पहले महात्मा को भी सूचना दे दें। गांधी से उनकी मुलाकात 1 नवंबर 1947 की शाम बिरला हाउस में हुई। अपने संस्मरण ‘स्लेंडर वाज द थ्रेड’ में उन्होंने लिखा- उन्होंने (गांधी) मेरी बातों को ध्यान से सुना। फिर उन्होंने कहा : युद्ध मानवता के लिए एक अभिशाप हैं।
वे बिलकुल मूर्खतापूर्ण हैं। उनसे तकलीफ और बरबादी के सिवा कुछ नहीं हासिल होता। एक सैनिक होने के नाते, जो कुछ घंटे बाद ही एक लड़ाई लड़ने जा रहा था, मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूं। मैंने पूछा : कश्मीर में मुझे क्या करना चाहिए?
महात्मा गांधी ने मुस्कराते हुए कहा : “आप बेकसूर लोगों की रक्षा करने, उन्हें तकलीफों से बचाने और उनकी जायदाद को तबाही से बचाने के लिए जा रहे हैं। जाहिर है कि इस मकसद को पूरा करने के लिए आपको अपने पास मौजूद हर साधन का पूरा इस्तेमाल करना चाहिए।’
नेहरू की आलोचना की जाती है कि वे कश्मीर मसले को यूएन ले गए। लेकिन तथ्य यह है कि वे सैन्य तरीकों से भी भारत के हितों को मजबूत करने की कोशिश करते रहे। पाकिस्तान आधुनिक हथियारों और सैन्य प्रशिक्षण के बूते जो बढ़त बनाने की कोशिश करता रहा, नेहरू उस अंतर को पाटने की कोशिश करते रहे।
उस दशक में भारत ने ब्रिटेन से मदद के रूप में नहीं, बल्कि सीधी खरीद के रूप में हंटर विमानों, सेंचुरियन टैंकों को हासिल करना शुरू किया। नेहरू के 17 साल के कार्यकाल में भारत किसी लिहाज से ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं था। उसने पाकिस्तान से लोहा लिया, चीन का मुकाबला किया, हैदराबाद में निजाम/रजाकारों की चुनौती को निबटाया, गोवा को पुर्तगाली कब्जे से आजाद कराया।
उसी दौरान नगा बगावत भी शुरू हो गई थी। नेहरू वहां सेना भेजने और अफस्पा लागू करने में कतई नहीं झिझके। अफस्पा नेहरू की ही देन है! उनके उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री सेना के इस्तेमाल से कश्मीर को हड़पने की पाकिस्तानी कोशिश को हमेशा के लिए नाकाम करने के लिए अमर हो चुके हैं।
इंदिरा गांधी का इतिहास तो ज्ञात ही है, जिसमें 1971 की लड़ाई शामिल है। मुझे नहीं लगता कोई व्यक्ति इंदिरा गांधी पर भारत को ‘सॉफ्ट स्टेट’ बनाने का आरोप लगा सकता है। मिजो बागियों की घेराबंदी तोड़ने के लिए आइजोल पर वायुसेना के इस्तेमाल का आदेश इंदिरा गांधी ने जनवरी 1966 में शपथ ग्रहण करने के छह सप्ताह के भीतर ही दे दिया था। अपने ही नागरिकों के खिलाफ वायुसेना के इस्तेमाल की नैतिकता पर इतिहास तो बहस करेगा, लेकिन क्या ‘हार्ड स्टेट’ ठीक यही नहीं किया करते?
मोरारजी देसाई को हम एक शांतिवादी प्रधानमंत्री मान सकते हैं, लेकिन चंद महीनों चली उनकी सरकार ने ही जैगुआर विमानों की खरीद के ऑर्डर दिए थे, जिन्हें भारतीय वायुसेना आज भी उड़ा रही है। इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ, और सियाचिन मसले पर शानदार कदम उठाया गया।
उन्हें स्वर्ण मंदिर में सेना भेजनी चाहिए थी या नहीं, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन उन्होंने भारत को एक ‘हार्ड स्टेट’ ही बनाया। राजीव गांधी ने पहली बार भारत की सैन्य शक्ति का इस्तेमाल विदेश में किया। हम श्रीलंका और मालदीव की बात कर रहे हैं।
डिफेंस पर उन्होंने जितना खर्च किया, उतना किसी दूसरे प्रधानमंत्री ने नहीं किया। उनकी सरकार के रक्षा बजट ने जीडीपी के 4% की सीमा को तोड़ा। आज अगर कोई युद्ध हुआ तो उसमें वही साजो-सामान इस्तेमाल होंगे, जिनकी खरीद के ऑर्डर राजीव गांधी ने दिए थे। उन्होंने भारत को कहीं ज्यादा ‘हार्ड’ ही नहीं, बल्कि हस्तक्षेपकारी स्टेट बनाया।
1990 की गर्मियों में पाकिस्तान ने जब परमाणु हथियारों की धमकी दी तो वीपी सिंह की सरकार ने करारा जवाब दिया था। नरसिंह राव ने जिस तरह पंजाब और कश्मीर में बगावत खत्म की, अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारे, वे भारत को ‘हार्ड स्टेट’ के रूप में बहाल करने की कहानी ही कहते हैं। उनके उत्तराधिकारी अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने दो सबसे जोखिम भरे फैसले किए : पोकरण में परमाणु परीक्षण और अमेरिका के साथ परमाणु संधि करने के।
और अंत में, नरेंद्र मोदी का दौर। “घर में घुसकर मारने’ की घोषणा के साथ भारत के सख्त तेवर सामने आए। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट, ऑपरेशन सिंदूर ने न्यू-नॉर्मल का नया पैमाना स्थापित किया। मोदी ने सिर्फ यह भूल की कि अपने शुरू के 11 वर्षों में डिफेंस पर पर्याप्त खर्च नहीं किया और ‘एक रैंक, एक पेंशन’ के लिए रक्षा बजट में अतिरिक्त प्रावधान नहीं किया। लेकिन मनमोहन सिंह जिसे आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे, मोदी राज में उस हथियारबंद माओवाद का खात्मा भी कर दिया गया है। इस सबको ‘हार्ड स्टेट’ की निशानी ही माना जाएगा।
नेहरू-इंदिरा से आज तक… नेहरू के कार्यकाल में भारत किसी लिहाज से ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं था। उसने पाकिस्तान से लोहा लिया, हैदराबाद में निजाम/रजाकारों की चुनौती को निबटाया, गोवा को पुर्तगाली कब्जे से आजाद कराया। अफस्पा नेहरू की ही देन है। 1965 के युद्ध के लिए शास्त्री और 1971 के लिए इंदिरा का नाम अमर है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)







