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6 घंटे पहले
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आज (20 अप्रैल) अक्षय तृतीया है। इसे अबूझ मुहूर्त माना जाता है यानी आज बिना मुहूर्त देखे ही शादी, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ जैसे शुभ काम किए जा सकते हैं। इस तिथि पर भगवान परशुराम का प्रकट उत्सव भी मनाते हैं। परशुराम अजर-अमर यानी अक्षय माने गए हैं। अक्षय का अर्थ है- जिसका कभी क्षय न हो यानी जो हमेशा रहने वाला हो, जो कभी खत्म नहीं होगा। इनकी जन्मतिथि होने की वजह से ही वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय नाम मिला है।
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया पर धर्म-कर्म, दान-पुण्य करने के साथ ही खरीदारी करने की भी परंपरा है, खासतौर पर लोग इस दिन सोना खरीदते हैं, सोने में निवेश करते हैं। माना जाता है कि इस दिन खरीदा गया सोना लाभ देता है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि लेकर आता है। इसी वजह से अधिकतर लोग अक्षय तृतीय पर सोना खरीदते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, इस बार तिथियों की घट-बढ़ की वजह से वैशाख शुक्ल तृतीया 19 अप्रैल को भी थी और आज भी ये तिथि है। चूंकि 20 तारीख की सुबह तृतीया तिथि में सूर्योदय हुआ है, इसलिए आज अक्षय तृतीया मनाना ज्यादा शुभ है।

ऋग्वेद में सोने को कहा गया है हिरण्य
ऋग्वेद में सोने को हिरण्य कहा गया है। हिरण्य संस्कृत शब्द है और इसका अर्थ है चमकदार, कीमती पीली धातु यानी सोना। ग्रंथों के मुताबिक, सोने की उत्पत्ति सूर्य के तेज से हुई है। इसलिए इसे सूर्य के तेज और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। सोने को देवताओं के अमरत्व से जोड़ा गया है। ये धातु अमरत्व से जुड़ी है, इसलिए इसे पवित्र माना जाता है और इसी वजह से यह देवी-देवताओं को भी बहुत प्रिय है।

अक्षय तृतीया से जुड़ी परंपराएं
- गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलते हैं
उत्तराखंड में स्थित गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया के दिन ही श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। यह चारधाम यात्रा की औपचारिक शुरुआत का संकेत है। हजारों श्रद्धालु इस दिन इन दोनों धामों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
इस साल तिथियों की घट-बढ़ की वजह से अक्षय तृतीया 19 और 20 अप्रैल को दो दिन है। इसलिए गंगोत्री-यमुनोत्री के कपाट 19 तारीख को ही भक्तों के लिए खुल गए हैं।
मान्यता: इस दिन गंगा और यमुना नदियों में स्नान करने और इनके दर्शन से भक्तों की परेशानियां दूर होती हैं।
- पुरी मंदिर की चंदन यात्रा
ओडिशा के प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी मंदिर में अक्षय तृतीया से चंदन यात्रा उत्सव की शुरुआत होती है, यह उत्सव कई दिनों तक चलता है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं को चंदन का लेप लगाया जाता है और विशेष शोभायात्राएं निकाली जाती हैं।
मान्यता: महाप्रभु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को शीतलता देने के लिए चंदन का लेप लगाते हैं।
- सिंहाचलम मंदिर में नृसिंह प्रतिमा का चंदन लेप हटाना
आंध्र प्रदेश के सिंहाचलम मंदिर में केवल एक दिन के लिए अक्षय तृतीया पर नृसिंह भगवान की प्रतिमा से चंदन का लेप हटाया जाता है। पूरे दिन भक्त भगवान की वास्तविक प्रतिमा के दर्शन कर पाते हैं।
मान्यता: सिंहाचलम मंदिर में स्थापित भगवान नृसिंह की प्रतिमा सालभर चंदन के लेप से ढंकी रहती है, इस लेप की मोटाई काफी अधिक होती है। नृसिंह भगवान उग्र अवतार है, इन्हें शांत और शीतल रखने के लिए मूर्ति को सालभर चंदन के लेप से ढंका रखते हैं।










