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शंकराचार्य जी ने दो बातें हमारे बड़े काम की बोली हैं। पहली बात वे कहते हैं मंदिर वही पहुंचता है, जो धन्यवाद देने जाता है, मांगने नहीं। और दूसरी बात, वास्तविक आनंद उन्हीं को मिलता है, जो आनंद की तलाश नहीं करते। तो पहली बात को यूं समझें कि जब भी हम लोग मंदिर जाएं, ईश्वर को धन्यवाद देना चाहें तो उसका एक तरीका है। हमारे मंदिरों में ईश्वर की प्राण प्रतिष्ठा इसीलिए की गई है कि वो प्रतिमाएं जीवित हो जाती हैं और उनको एकटक देखकर दर्शन करने की व्यवस्था है। कहते हैं आंखों का सबसे अच्छा उपयोग है ईश्वर की प्रतिमा को एकटक देखना और दूसरा है दर्पण में स्वयं अपनी आंखों को देखना। और दूसरा शंकराचार्य जी कहते हैं वास्तविक आनंद क्या होता है? जब हम किसी बात का अनुभव करते हैं तो हमें खुशी मिलती है, पर जब अनुभव अनुभूति में बदल जाता है तब आनंद मिलता है। हम जब भी कोई सांसारिक काम करें, उसमें आध्यात्मिक छींटा जरूर लगाएं तो हमें सांसारिक कार्यों का अनुभव मिलेगा और हमारे काम में ईश्वरीय उपस्थिति है, इस बात की अनुभूति होगी।
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