अभय कुमार दुबे का कॉलम:  उत्तर बनाम दक्षिण का मसला फिर से तूल पकड़ने लगा है
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अभय कुमार दुबे का कॉलम: उत्तर बनाम दक्षिण का मसला फिर से तूल पकड़ने लगा है

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10 घंटे पहले

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अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर

हालांकि संघवाद का मसला पिछले कुछ वर्षों से बहस के केंद्र में था, लेकिन यह अंदाजा किसी को नहीं था कि यह अचानक दक्षिण बनाम उत्तर, विकास बनाम पिछड़ापन, आबादी-नियंत्रण बनाम आबादी के विस्तार और हिंदी बनाम तमिल के रूप में निकलकर आ जाएगा। अभी केवल तमिलनाडु के सीएम स्टालिन और कर्नाटक के सीएम सिद्धरमैया ने ही इसे उठाया है।

लगता है जल्द ही तेलंगाना और केरल से भी ऐसी ही आवाजें आने लगेंगी। आंध्र में सरकारी पार्टी केंद्र में सत्तारूढ़ गठजोड़ की सदस्य है, इसलिए सीएम इसे उठाने से हिचकेंगे, पर विपक्ष में खड़ी वाईएसआर कांग्रेस इस पर तत्परता से जोर देगी।

ऐसे ही मसलों के कारण साठ के दशक में तमिलनाडु के नेता (खासतौर से करुणानिधि) अपनी राष्ट्रीयता भारतीय न बताकर द्रविड़ बताने लगे थे। इस मसले को द्रविड़ बनाम आर्य के रूप में परिभाषित किए जाने का खतरा भी है।

ऐसा होने पर कुछ महाराष्ट्रीयन भी समर्थन में आ सकते हैं। उन्हें बस महात्मा फुले की उस विरासत को जगाने की जरूरत है, जिसके केंद्र में आर्य आक्रमण की थीसिस है। सच्चाई तो यह है कि इस बार इस विवाद में साठ के दशक से भी ज्यादा तीखापन आने का डर है। इसके दो कारण हैं।

पहला, दक्षिण भारतीय राज्यों को लग रहा है कि उनके ऊपर परिसीमन की तलवार लटक रही है। अगर आबादी को आधार बनाकर संसद की सीटों का नया परिसीमन किया गया तो एक अनुमान के अनुसार लगभग 900 सदस्यों वाली लोकसभा में 80 फीसदी से ज्यादा सीटें बिहार, यूपी, बंगाल, एमपी और राजस्थान के हिस्से में आएंगी और बाकी 20 फीसदी सीटों में दक्षिण भारत सिमट जाएगा।

दक्षिण को आबादी-नियंत्रण और आर्थिक विकास की सजा मिलेगी यानी उसकी सीटों में बहुत कम वृद्धि होगी, और उत्तर को आबादी बढ़ने देने और विकास की होड़ में पिछड़ने का राजनीतिक इनाम हासिल होगा यानी उसकी सीटों में बहुत अधिक बढ़ोतरी हो जाएगी।

दूसरा, केंद्र सरकार ने तमिलनाडु को दी जाने वाली समग्र शिक्षा स्कीम से संबंधित फंडिंग (2,152 करोड़ रुपए) रोक दी है। कारण यह बताया गया है कि इस प्रदेश ने 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने से इंकार कर दिया है। यह बड़ी रकम शिक्षा-अधिकार अधिनियम के प्रावधान के तहत केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं के लिए दी जानी थी।

स्टालिन को एनईपी पर मुख्य आपत्ति त्रिभाषा सूत्र को लेकर है। यह नीति 50 के दशक में राधाकृष्णन आयोग ने तैयार की थी, और इंदिरा सरकार ने 1968 में इसे पहली बार लागू किया था। मोटे तौर पर इसका मतलब यह है कि गैर-हिंदी प्रदेशों में माध्यमिक स्तर से ही छात्रों को हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई जानी चाहिए। और हिंदी प्रदेशों में अंग्रेजी और हिंदी के साथ एक अन्य आधुनिक भारतीय भाषा (जहां तक हो सके दक्षिण की कोई भाषा) की शिक्षा दी जानी चाहिए।

तमिलनाडु त्रिभाषा सूत्र को लागू नहीं करता। वह केवल दो भाषाएं (तमिल और अंग्रेजी) ही पढ़ाता है, हालांकि निजी स्कूल और केंद्रीय विद्यालय चाहें तो हिंदी पढ़ा सकते हैं। वह मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि एनईपी लागू करना संवैधानिक दायित्व है। वह कहता है कि यह तो मौजूदा सरकार की नीति है, और केंद्र में सरकार बदलने पर यह बदली भी जा सकती है।

तमिल नेताओं (जिनमें पी. चिदम्बरम भी शामिल हैं) की दलील है कि उत्तर में त्रिभाषा सूत्र का व्यावहारिक मतलब हिंदी, अंग्रेजी और तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ाना है। दक्षिण भारतीय भाषाएं वहां कोई नहीं पढ़ता। लेकिन दक्षिण पर हिंदी थोपी जाती है।

केंद्र दो तरीके से इसका समाधान कर सकता है। पहला, उसे तुरत-फुरत वह गणितीय फॉर्मूला तैयार करके पेश करना चाहिए, जो यह गारंटी करता हो कि आबादी के आधार पर परिसीमन में उन राज्यों को अपवाद बनाया जाएगा, जिन्होंने आबादी को नियंत्रित किया है।

दक्षिण के राज्यों की इस फॉर्मूले पर सहमति भी जरूरी है। जहां तक भाषा का सवाल है, सरकार को अपनी ही पहले की शिक्षा मंत्री के वक्तव्य का सम्मान करना चाहिए। स्मृति ईरानी ने मानव संसाधन मंत्री के रूप में कहा था कि हर प्रदेश अपने पाठ्यक्रमों और विषयों के बारे में स्वयं अंतिम फैसला कर सकता है। कांग्रेस के शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह का भी यही कहना था।

अगर केंद्र ने कुशलता से इसे सम्बोधित नहीं किया तो हो सकता है नजारा फिर से साठ के दशक जैसा बन जाए। राष्ट्रीय एकता के लिए अंदेशे पैदा होते जाएंगे। भाजपा के दक्षिण भारत में विस्तार के प्रोजेक्ट को भी नुकसान होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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