एन. रघुरामन का कॉलम:  लग्जरी हमेशा डिग्निटी से जुड़ी हुई रहती है
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एन. रघुरामन का कॉलम: लग्जरी हमेशा डिग्निटी से जुड़ी हुई रहती है

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जब कोई मेहमान होटल का सामान छिपाकर अपने बैग में रख लेता है तो कई हॉस्पिटैलिटी ब्रांड सख्त प्रोटोकॉल के साथ प्रतिक्रिया देते हैं। लेकिन असली लग्जरी इस बात से तय नहीं होती कि कोई ब्रांड अपनी संपत्ति की सुरक्षा कैसे करता है, बल्कि इससे तय होती है कि वह अपने मेहमान की डिग्निटी कैसे बचाए रखता है। इस फिलॉसफी का उत्कृष्ट उदाहरण मुंबई की ओबेरॉय प्रॉपर्टी में तब देखने को मिला, जब विजनरी होटेलियर बीआरएस ‘बिकी’ ओबेरॉय रिसेप्शन के पास अपने एक सहयोगी से बातचीत कर रहे थे और वहीं एक विदेशी मेहमान चेक-आउट कर रही थीं। जैसे ही उन्होंने बिल चुकाने के लिए पर्स खोला, होटल में आधे इस्तेमाल किए हुए शैम्पू और लोशन की छोटी बोतलें काउंटर पर गिर पड़ीं। मेहमान ठिठक गईं। पकड़े जाने की शर्मिंदगी चेहरे पर साफ दिख रही थी। लेकिन बिकी ने उन्हें नजरअंदाज करने या असहज स्थिति में ही छोड़ देने के बजाय अपने स्टाफ को निर्देश दिया कि मेहमान को अच्छे-से पैक की गई प्रीमियम स्किनकेयर उत्पादों की बास्केट गिफ्ट की जाए। यह मशहूर घटना इंडस्ट्री के लिए कालजयी सबक मानी जाती है : जब कोई ग्राहक आपकी प्रॉपर्टी से कुछ ले जाए तो उसे चोरी मानने के बजाय लगाव की अभिव्यक्ति की तरह देखना टकराव की संभावित स्थिति को जीवनभर की ब्रांड लॉयल्टी में बदल सकता है। इसी नैरेटिव को कॉर्पोरेट सर्विस हैंडबुक्स और बिजनेस केस स्टडीज में काफी विस्तार से बताया गया है, खासकर ओबेरॉय सेंटर ऑफ लर्निंग एंड डेवलपमेंट के ट्रेनिंग करिकुलम में। इसे ओबेरॉय एम्पावर प्रोग्राम की बुनियाद के तौर पर पढ़ाया जाता है। यहां तक कि हार्वर्ड बिजनेस स्कूल जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं ने भी इस पर केस स्टडी प्रकाशित की है कि यह ब्रांड अत्यधिक ऑपरेशनल इफिशियंसी और इस स्तर की संवेदनशीलता के बीच कैसे संतुलन बनाता है। मैंने स्वयं 1990 में इंडियन एक्सप्रेस में काम करते हुए इस बेहद भावुक कर देने वाली घटना को कवर किया था। सोमवार सुबह अत्यधिक सहानुभूति भरी यह कहानी मुझे तब याद आई, जब मैंने उसी अखबार में यह चौंकाने वाला आंकड़ा पढ़ा कि भारतीय रेलवे में एसी कोच के हर 1000 में से एक यात्री अपने बेडरोल का कम से कम एक सामान साथ ले जाता है। चाहे वह बेडशीट, कंबल, पिलो, पिलोकवर हो या फिर फेस टॉवल। सूचना के अधिकार पर आधारित एक रिपोर्ट दिल तोड़ने वाला यह खुलासा करती है कि बीते चार वर्षों में रेलवे यात्री कुल 1.27 करोड़ चीजें अपने साथ ले जा चुके हैं। अपने ट्रेवल सॉवेनियर इकट्‌ठे करने वाले यात्रियों को समझना चाहिए कि भारतीय रेलवे कोई ओबेरॉय होटल नहीं है और ट्रेन की चुराई गई बेडशीट शैम्पू की कॉम्प्लीमेंट्री बोतल नहीं है। इन चीजों को ले जाने वालों को ठहरकर सोचना चाहिए कि उनके सफलतापूर्वक निकल जाने के बाद वास्तव में होता क्या है। जब ट्रेन अंतिम स्टेशन पर पहुंचती है और सामान की गिनती मेल नहीं खाती तो भारतीय रेलवे ठेकेदार पर जुर्माना लगाती है। चूंकि गायब हुए सामान की मात्रा अधिक होती है तो ठेकेदार इस जुर्माने का बोझ सबसे निचले स्तर पर, यानी कोच अटेंडेंट पर डाल देता है। ये अटेंडेंट्स रोजाना महज 700 रुपए कमाते हैं। यदि वे महीने के पूरे 30 दिन तक एक भी छुट्टी लिए बिना, परिजनों के पास जाए बगैर काम करें, तब भी उनकी कुल कमाई सिर्फ 21 हजार रुपए ही होती है। फिर भी, हर महीने उनकी तनख्वाह से 2 से 3 हजार रुपए तक काट लिए जाते हैं। यह गहरी आर्थिक चोट उन्हें सिर्फ इसलिए मिली, क्योंकि एसी ट्रेन का टिकट खरीद सकने वाले किसी व्यक्ति ने कपड़े का एक टुकड़ा चुराना पसंद किया। जरा कल्पना कीजिए उस मेहनतकश पिता, उसके परिवार और उसके न दिखने वाले आंसुओं के बारे में, जो हर माह पगार में तीन हजार रुपए कम लेकर घर लौटता होगा। उसने जैसी मांगी गई, वैसी सेवा दी लेकिन फिर भी किसी अनजान व्यक्ति के कारण उसे दंड मिला। फंडा यह है कि अगली बार यात्रा के दौरान यदि हम किसी को ऐसे ‘सॉवेनियर’ साथ ले जाते देखें तो उसे समझाएं कि एक बेडशीट की कीमत कभी इतनी नहीं होती कि उसके लिए किसी गरीब की रोजी-रोटी छीन ली जाए।



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