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- Abhay Kumar Dubey’s Column There Are Chances Of Pakistan Breaking Into Pieces
11 घंटे पहले
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अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर
पाकिस्तान 1971 में एक बार विभाजित हो चुका है। 50 साल बाद उसके दूसरे विभाजन के अंदेशों को खारिज नहीं किया जा सकता। अगर पाकिस्तान इस बार टूटा तो कई टुकड़ों में बंट जाएगा। इस मसले में पहला सवाल यह है कि क्या पिछली बार हुए विभाजन का मॉडल फिर से दोहराया जा सकता है?
पिछले मॉडल में तीन बातें खास थीं। भारत के सैनिक हस्तक्षेप ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। 70 के दशक में चल रहे शीतयुद्ध के हालात में अमेरिका की पाकिस्तानपरस्ती को सोवियत संघ के भारत-समर्थन ने प्रभावहीन कर दिया था। उस समय का पाकिस्तान पहले से ही बेहद अस्वाभाविक दो दूरदराज भौगोलिक हिस्सों में बंटा था।
पाकिस्तान के विभाजन का एक दूसरा संभावित मॉडल भी है, जो वहां की भीतरी राजनीति की विकृतियों के कारण हो सकने वाले अंत:विस्फोटों से जुड़ा है। इन भीतरी विस्फोटों के अंदेशे सबसे पहले 2022 में प्रबलता से सामने आए थे, जब पाकिस्तान के एक बड़े नेता ने खुलेआम सिलसिलेवार बताया था कि पाकिस्तान अगर टूटेगा तो कैसे और क्यों टूटेगा। यह वक्तव्य इमरान खान का था, जो प्रधानमंत्री रह चुके थे और मांग कर रहे थे कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाये जाएं ताकि पाकिस्तान को टूट के खतरे से बचाया जा सके।
इमरान ने कहा था : “अगर एस्टैब्लिशमेंट सही फैसले नहीं करेगा, तो ये भी तबाह होंगे। अगर हम डिफॉल्ट कर जाते हैं तो सबसे बड़ा इदारा कौन-सा है जो हिट होगा? पाकिस्तानी फौज। जब फौज हिट होगी तो उसके बाद हमारे से कंसेशन क्या ली जाएगी? जो यूक्रेन से ली थी डी-न्यूक्लियराइज करने की। सबसे बड़ा मसला तो यह है कि हमारा वाहिद मुसलमान मुल्क है, जिसके पास न्यूक्लियर डिटरेंट है। वो चला गया तो क्या होगा? पाकिस्तान के तीन हिस्से होंगे।’
यहां इमरान अलग सिंध राष्ट्र, पख्तून राष्ट्र और बलूच राष्ट्र की तरफ इशारा करते सुनाई दे रहे हैं। बाकी रह जाएगा केवल पंजाब वाला पाकिस्तान। जिस समय का यह वक्तव्य है, उस समय सिंध में बार-बार कर्फ्यू लगाया जा रहा था। खैबर-पख्तूनख्वा के नेता अपनी प्रादेशिक फौज को इस्लामाबाद के खिलाफ इस्तेमाल करने की धमकी दे रहे थे। बलूचिस्तान में हथियारबंद बागी सेना पर हमले कर रहे थे।
आज इमरान जेल में हैं। उनकी पार्टी राजनीतिक रूप से तकरीबन निष्क्रिय कर दी गई है। शाहबाज शरीफ फौज के प्यादे की तरह हुकूमत कर रहे हैं। इस बात को अमेरिका जानता है और इसीलिए विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत से संघर्ष-विराम करवाने के लिए शरीफ से पहले जनरल आसिम मुनीर से बात की थी। अगर अमेरिका ने मेहरबानी करके आईएमएफ से सवा दो अरब डॉलर न दिलवाए होते, तो वही डिफॉल्ट वाली हालत बन जाती जिसका इमरान ने जिक्र किया।
पाकिस्तान को विभाजन से तीन ताकतें रोके हुए हैं- उसकी फौज, अमेरिका और चीन। फौज ने वास्तविक राजनीतिक प्रक्रिया को स्थगित करके पूरी तरह से फर्जी राजनीतिक प्रक्रिया थोप रखी है। इमरान जेल में जरूर हैं, लेकिन वे पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।
अगर आज ईमानदारी से चुनाव हो जाएं तो उन्हें एकतरफा जीत हासिल होगी। अमेरिका पाकिस्तान की दरकती हुई अर्थव्यवस्था को किसी तरह टिकाए हुए है। पाकिस्तान पर अनापशनाप विदेशी ऋण है, और उसका पांचवां हिस्सा चीन का दिया हुआ है।
दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका और उसके बराबर आने की कोशिश कर रहा चीन, दोनों ही चाहते हैं कि पाकिस्तान चार हिस्सों में टूटकर नष्ट न हो। वे चाहते हैं कि दक्षिण एशिया में भारत के उभार को रोकने के लिए पाकिस्तान उसकी टांग खींचने के लिए बना रहे।
अगर पाकिस्तान को स्थायी रूप से टिकना है तो वहां राजनीतिक प्रक्रिया बहाल करनी होगी। चुनी हुई लोकप्रिय सरकार को बलूच, सिंध और पख्तून उपराष्ट्रीयता के नुमाइंदों को वार्ता की मेज पर बैठाना होगा। उन्हें सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वायत्तता देनी होगी।
भारत ने 1947 के बंटवारे के बाद नगालैंड, मिजोरम, पंजाब, कश्मीर और शुरुआती दौर में तमिलनाडु की अलगाववादी राजनीति को विभिन्न रणनीतियों का इस्तेमाल करके निष्प्रभावी किया, और अपनी राष्ट्रीय एकता की रक्षा करके दिखाई। पाकिस्तानी चाहें तो इस मामले में भारत से सीख सकते हैं।
अगर पाकिस्तान को स्थायी रूप से टिकना है तो अपने यहां राजनीतिक प्रक्रिया बहाल करनी होगी। चुनी हुई लोकप्रिय सरकार को बलूच, सिंध और पख्तून उपराष्ट्रीयता के नुमाइंदों को वार्ता की मेज पर बैठाना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)








