![]()
ओहायो के एक स्कूल में… पहली कक्षा के टीचर विलियम वर्नर जब देखते हैं कि उनके छात्र अपनी एकाग्रता खो रहे हैं, तो वे अनोखा आदेश देते हैं, ‘गिव मी 10…! इसके तुरंत बाद पूरी क्लास उत्साह से भरकर 10 बार जंपिंग जैक्स करने लगती है। इसे ‘ब्रेन ब्रेक’ कहा जाता है। , जिससे वे फिर से ध्यान लगा पाते हैं। टोलेडो स्थित ‘मैककिनले स्टीम एकेडमी’ जैसे अमेरिका के कई स्कूल अब इस चुनौती को अवसर में बदल रहे हैं। यहां बच्चों को शांत बैठने के लिए डांटा नहीं जाता, बल्कि उनके सीखने के तरीके को ही बदल दिया गया है। शोध बताते हैं कि क्लासरूम में लैपटॉप और स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल से 75% शिक्षकों ने छात्रों की एकाग्रता अवधि में गिरावट महसूस की है। ब्रेन क्रेक’ व मेडिटेशन से…इसी का समाधान ‘फिजिकल एक्टिविटी’ में ढूंढ़ा जा रहा है। स्कूलों में एडुटेनमेंट का चलन बढ़ रहा है। कंप्यूटर साइंस की टीचर लॉरेल डैनियल 45 मिनट के लेक्चर को छोटे हिस्सों (माइक्रो-लेसन्स) में बांटती हैं। इससे छात्र ऊबते नहीं हैं। जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझाने के लिए भी अनोखे प्रयोग हो रहे हैं। 5वीं के छात्र खुद कक्षा में गोल घूमकर पृथ्वी का ‘रोटेशन’ और ‘रेवोल्यूशन’ समझते हैं। अब छात्रों को रटने की जरूरत नहीं पड़ती; वे खेल-खेल में सीख जाते हैं कि पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में घूमती है और 365 दिनों में सूर्य का चक्कर लगाती है। केजी के बच्चे दिन की शुरुआत मेडिटेशन से करते हैं। आंखें बंद कर ‘आर्कटिक’ की कल्पना करते हैं, जिससे चंचल मन को शांति मिलती है। 8वीं में जेनेटिक्स जैसा कठिन विषय मार्शमैलो व कैंडी के जरिए पढ़ाया जा रहा है। छात्र बताते हैं कि जब वे समूहों में काम करते हैं व हाथ से कुछ रचनात्मक करते हैं, तो दिलचस्पी पारंपरिक लेक्चर के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। क्लासरूम्स में ऐसे सेंसर लगाए जा रहे हैं जो छात्रों के चेहरे के हाव-भाव व जुड़ाव स्तर को भांप लेते हैं। पूरी क्लास का ‘ध्यान स्तर’ गिरता है, तो सिस्टम टीचर को संकेत देता है कि अब ‘ब्रेन ब्रेक’ या ग्रुप डिस्कशन की जरूरत है। ब्रेक लेने से न्यूरल नेटवर्क मजबूत होता है- एक्सपर्ट मनोविज्ञान की प्रोफेसर एमिली इलियट के अनुसार, बार-बार ध्यान लगाने और बीच में ब्रेक लेने से न्यूरल नेटवर्क मजबूत होता है। इन नवाचारों का सबसे सुखद नतीजा यह है कि अब छात्र क्लास के दौरान फोन की ओर नहीं भागते। उन्हें यह समझ आ रहा है कि सीखना हमेशा मजेदार नहीं हो सकता, लेकिन चुनौतीपूर्ण और रचनात्मक जरूर हो सकता है। स्कूलों का यह बदला हुआ स्वरूप साबित कर रहा है कि अगर पढ़ाने का तरीका बदल जाए, तो डिजिटल युग के बच्चे भी घंटों ध्यान लगा सकते हैं।
Source link








