अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम:  धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए भी न्यायालय की शरण क्यों?
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अर्घ्य सेनगुप्ता और स्वप्निल त्रिपाठी का कॉलम: धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए भी न्यायालय की शरण क्यों?

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मध्य प्रदेश के भोजशाला परिसर विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को तीन हफ्ते में सुनवाई पूरी करने के निर्देश दिए हैं और इस मामले में अगली सुनवाई 2 अप्रैल को होगी। भोजशाला 11वीं शताब्दी का एक संरक्षित स्मारक है। इसे हिंदुओं द्वारा देवी सरस्वती के मंदिर के रूप में माना जाता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में पहचानता है। 2003 में दोनों समुदायों के दावों को संबोधित करने के उद्देश्य से एएसआई ने मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज के लिए दोपहर 1 से 3 बजे तक परिसर में प्रवेश की अनुमति दी, जबकि हिंदुओं को वसंत पंचमी के अवसर पर समारोह आयोजित करने की अनुमति दी गई। इस वर्ष वसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ी। न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया। न्यायालय ने दोनों समुदायों को उसी दिन प्रार्थना करने की अनुमति दी और समय-निर्धारण तथा प्रवेश-व्यवस्था को प्रबंधित किया। एक स्तर पर यह हस्तक्षेप व्यावहारिक प्रतीत होता है। किंतु यह प्रकरण साझा धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों में न्यायिक भूमिका के विस्तार पर एक संवैधानिक प्रश्न को जन्म देता है। भोजशाला का मामला कोई अलग घटना नहीं है। यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें न्यायालय के दरवाजे धार्मिक व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए भी खटखटाए जाने लगे हैं। न्यायालय के समक्ष हुई चर्चाओं से स्पष्ट है कि मुख्य मुद्दे प्रशासनिक थे- समय प्रबंधन, प्रवेश का विनियमन तथा समूहों के बीच समन्वय। ये ऐसे विषय हैं, जिन्हें सामान्यतः त्योहारों, जुलूसों या सार्वजनिक स्थलों के साझा उपयोग के दौरान जिला प्रशासन संभालता है। जब इस प्रकार के तार्किक एवं प्रशासनिक प्रश्न बार-बार न्यायिक निगरानी की आवश्यकता उत्पन्न करते हैं, तो यह एक संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देता है, जिसमें न्यायालय प्रशासनिक दायित्व निभाने लगते हैं। यह बदलती प्रथा 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप अधिनियम की पृष्ठभूमि में और महत्वपूर्ण जाती है। बढ़ते सांप्रदायिक तनावों के बाद पारित इस अधिनियम ने 15 अगस्त 1947 को विद्यमान धार्मिक चरित्र को स्थिर कर दिया और उसके परिवर्तन पर रोक लगा दी। इसका उद्देश्य स्पष्ट था- ऐतिहासिक धार्मिक दावों के न्यायिक पुनःउद्घाटन को रोकना और यह सुनिश्चित करना कि देश अतीत के विवादों में उलझा न रहे। लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस विधायी समझौते की दृढ़ता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। ज्ञानवापी मामले में, वाराणसी की जिला अदालत ने मस्जिद परिसर के सर्वे का निर्धारण करने के लिए एएसआई सर्वेक्षण का आदेश दिया, जिसे उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि ऐसा सर्वेक्षण 1991 के अधिनियम का उल्लंघन होगा। इस आशंका के प्रत्युत्तर में कि ऐसे सर्वेक्षण निराधार दावों को प्रोत्साहित कर सकते हैं, मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की थी कि जो आपको निराधार लगता है, वह दूसरे पक्ष के लिए आस्था हो सकती है। धार्मिक सह-अस्तित्व के लिए बार-बार न्यायालयों का सहारा लेना एक गहरी संस्थागत चिंता को दर्शाता है। यह न केवल कार्यपालिका पर निष्पक्ष मध्यस्थता के लिए विश्वास में कमी को इंगित करता है, बल्कि समुदायों के बीच स्थानीय स्तर पर संवाद की दुर्बलता को भी प्रकट करता है। भोजशाला मामले में न्यायालय के समक्ष हुई चर्चाएं दर्शाती हैं कि पक्षकार व्यावहारिक समाधान पर विचार करने में सक्षम थे। दोनों पक्षों ने एक साथ प्रार्थना की अनुमति पर सहमति जताई थी। इस प्रकार का आपसी सद्भाव स्वागतयोग्य है। ऐसे प्रशासनिक प्रबंध सामान्यतः जिला स्तर पर त्योहारों आदि पर किए जाते हैं। लेकिन जब इन पर उच्च न्यायालयों की मुहर आवश्यक हो जाती है, तो यह प्रशासनिक विश्वसनीयता में घटते भरोसे का संकेत हो सकता है। भोजशाला का मामला कोई अलग घटना नहीं है। यह उस प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें न्यायालय के दरवाजे अधिकारों के निर्धारण के लिए ही नहीं, बल्कि धार्मिक व्यवस्थाओं की निगरानी के लिए भी खटखटाए जा रहे हैं। (ये लेखकों के अपने विचार हैं)



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