गौरव पाठक13 घंटे पहले
- कॉपी लिंक

अब भारतीय पहले से कहीं ज्यादा घूमने निकल रहे हैं। तेज परिवहन, कनेक्शन और बेहतर नेटवर्क के साथ यात्री अपनी यात्रा के दौरान एक बुनियादी स्तर की सुविधा और सफाई की उम्मीद करते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 इन उम्मीदों को कानूनी अधिकारों में बदल देता है। अगर सेवा में कमी मिलती है, तो यात्री उपभोक्ता फोरम में शिकायत कर सकते हैं। यहां तक कि सिर्फ मानसिक कष्ट होने पर भी। दो फैसले (एक एयरलाइन और एक रेलवे के खिलाफ) दिखाते हैं कि ये अधिकार जमीनी स्तर पर कैसे काम करते हैं।
यात्रियों को क्या हैं अधिकार? धारा 2(7) के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो किसी तरह की सेवा, शुल्क देकर लेता है, वह ‘उपभोक्ता’ कहलाता है। इसमें टिकट लेकर यात्रा करने वाले हवाई और रेल यात्री दोनों शामिल हैं। जब यह संबंध स्थापित हो जाता है तो यात्री कमी या दोष रहित सेवा लेने का अधिकारी बन जाता है। अधिनियम में सूचना पाने का अधिकार, शिकायत दर्ज करने का अधिकार और उपभोक्ता जागरूकता का अधिकार भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि सेवा प्रदाता न सिर्फ वादे के मुताबिक सेवा देंगे, बल्कि शिकायत मिलने पर उचित कार्रवाई भी करेंगे।
विमान यात्रा: जब सीट गंदी मिली पिंकी नामक 60 वर्षीय यात्री बाकू (अजरबैजान) से नई दिल्ली जा रही इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय उड़ान में सवार हुईं। उन्हें खिड़की वाली पहले से अलॉट सीट मिली, लेकिन वह गंदी और अस्वच्छ थी। शिकायत करने पर क्रू खिड़की वाली साफ सीट नहीं दे पाया और उन्हें बीच की सीट दी गई, जो परिवार से अलग थी। फोटो सबूत से गंदगी साबित हुई। एयरलाइन जरूरी रिकॉर्ड भी पेश नहीं कर सकी, जैसे कि ‘सिचुएशन डेटा डिस्प्ले’ या विमान की सफाई के लॉग्स, जो नागरिक उड्डयन महानिदेशालय के नियमों के अनुसार जरूरी होते हैं। आयोग ने इसे धारा 2(11) के तहत ‘सेवा में कमी’ माना। साथ ही धारा 2(47) के तहत ‘अनुचित व्यापार प्रथा’ भी माना, क्योंकि एयरलाइन के विज्ञापनों में वादा ‘हैसल-फ्री’ (बिना परेशानी वाली) यात्रा का था, जबकि हकीकत इसके उलट थी। डीजीसीए के हाइजीन नियमों का पालन न करना मामले को और मजबूत बना गया। नतीजतन, यात्री को मानसिक कष्ट के लिए 1.5 लाख रुपए और मुकदमे के खर्च बतौर ₹25 हजार रुपए देने का आदेश हुआ।
रेल यात्रा: गंदे कंबल, घटिया खाना यह मामला असम राज्य आयोग का साल 2015 का है। एक वरिष्ठ नागरिक डॉ. लोकेन्द्र प्रसाद डेका एसी-2 टियर कोच में बेंगलुरु से गुवाहाटी तक की यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान उन्हें गंदी चादर व गंदे कंबल, घटिया खाना, चार्जिंग पॉइंट न होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। लिखित शिकायतों का रेलवे ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर प्रत्येक यात्री को 20 हजार रुपए का मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने संबंधी जिला उपभोक्ता मंच के आदेश को राज्य आयोग ने बरकरार रखा। आयोग ने कहा कि यह ‘सेवा में कमी’ और ‘अनुचित व्यापार प्रथा’ है, क्योंकि यात्री की उचित शिकायतों को नजरअंदाज किया गया। रेलवे का यह तर्क खारिज कर दिया गया कि सुविधाओं के लिए ठेकेदार ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि मुख्य सेवा प्रदाता के रूप में रेलवे ही अंततः जवाबदेह होती है।
इन मामलों से निकलते कानूनी सिद्धांत इन फैसलों से स्पष्ट है कि यात्रा के दौरान सुविधाओं का मानक (सर्विस स्टैंडर्ड) कानूनी रूप से लागू होता है। साफ-सफाई, आराम और मूलभूत सुविधाएं अनुबंध का हिस्सा हैं और इन्हें न देना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 का उल्लंघन है। सेक्टर-विशेष के नियम जैसे एयरलाइंस के लिए डीजीसीए के सिविल एविएशन रिक्वायरमेंट्स और रेलवे की यात्री सुविधा गाइडलाइंस, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को मजबूत करते हैं। इन नियमों का उल्लंघन ‘सेवा में कमी’ साबित करने में अहम सबूत बन सकता है।
यात्रीगण इन बातों का ध्यान रखें अगर यात्रा के दौरान ऐसी समस्या हो तो तुरंत फोटो लें, टिकट/बोर्डिंग पास सुरक्षित रखें और सेवा प्रदाता की ग्रिवेंस सेल में लिखित शिकायत दें। शिकायत में धारा 2(11) और धारा 2(47) का जिक्र करने से कानूनी आधार मजबूत होता है। भले ही यात्रा पूरी हो चुकी हो, फिर भी मुआवजा मिल सकता है। मुआवजा सिर्फ आर्थिक नुकसान के लिए नहीं, बल्कि असुविधा, अपमान और मानसिक कष्ट, खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी दिया जा सकता है। (लेखक सीएएससी के सचिव भी हैं।)








