रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  1951 में आई फिल्म ‘मल्हार’ का ‘बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम’ था पहला सुपरहिट गाना
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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: 1951 में आई फिल्म ‘मल्हार’ का ‘बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम’ था पहला सुपरहिट गाना

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रूमी जाफरी3 घंटे पहले

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गीतकारों की शृंखला में अगर मशहूर गीतकार इंदीवर जी के बारे में बात न की जाए तो ये कड़ी अधूरी ही रह जाएगी। इसलिए मेरे हिस्से के किस्से में आज बात करते हैं इंदीवर जी की।

उनसे मेरे बहुत करीबी तालुक्कात थे। उनके साथ मैंने बहुत-सा वक्त गुजारा है। मैं उनके घर जाता था, वो मेरे घर आते थे। उन्होंने मुझे अपने बारे में काफी कुछ बताया था। उन्होंने बताया था, मैं जब फिल्म इंडस्ट्री में आया, तो मुझे काम ही नहीं मिल रहा था, क्योंकि मैं मूलत: हिंदी का कवि और लेखक था। फिल्म इंडस्ट्री में उस वक्त उर्दू का बोल-बाला था। मैंने मेहनत करके उर्दू सीखनी शुरू की। कुछ फिल्में मिली भी, मगर कामयाबी नहीं मिली। 1946 में नमक, 1947 में काला बाजार, इम्तिहान, आहुति आई, मगर कुछ फायदा नहीं हुआ। फिर 1951 में आई ‘मल्हार’ में मेरा एक गाना “बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम, प्यार की दुनिया में ये पहला कदम’ सुपरहिट हो गया।

हालांकि गाना भले ही हिट हो गया, लेकिन मैं कामयाब नहीं हुआ। मुझे काम नहीं मिला। थोड़ी-बहुत छोटी-मोटी फिल्में जैसे शीशम, दाना पानी, डाकू की लड़की वगैरह मिली, मगर स्ट्रगल खत्म नहीं हुआ। खर्चा-पानी चलाना मुश्किल हो रहा था। उस वक्त बॉम्बे में मराठी, गुजराती, इंग्लिश, उर्दू, यहां तक की फारसी के भी टीचर्स मिल जाते थे, मगर हिंदी का टीचर बड़ी मुश्किल से मिलता था। उस वक्त वी. शांताराम एक नया हीरो लॉन्च कर रहे थे और उस हीरो को हिंदी सिखानी थी, डायलॉग हिंदी में थे। वो हिंदी का टीचर ढूंढ़ रहे थे तो किसी ने मेरा नाम रिकमेंड कर दिया। मैं उनके पास गया और उन्होंने उस एक्टर से मिलाते हुए मुझसे कहा िक मैं इनको बतौर हीरो लॉन्च कर रहा हूं।

इंदीवर के लिखे अनेक सुपरहिट गीतों में शामिल ‘नदिया चले चले रे धारा’ गीत का एक दृश्य (बाएं)।

इंदीवर के लिखे अनेक सुपरहिट गीतों में शामिल ‘नदिया चले चले रे धारा’ गीत का एक दृश्य (बाएं)।

तुम इनको हिंदी सिखाओ। तो मैंने उन्हें हिंदी सिखानी शुरू की, जिससे मुझे कुछ पैसे मिलने लगे। लेकिन मेरा फोकस और मेरी मोहब्बत थी फिल्मों में गाने लिखना। तो उस दिशा में भी मेरी कोशिश और स्ट्रगल जारी रहा। जिस एक्टर को मैं हिंदी सिखाता था, उसका नाम था जितेंद्र। फिल्म का नाम था ‘गीत गाया पत्थरों ने’। ये बात जितेंद्र कभी नहीं भूले और उन्होंने मेरा हमेशा साथ दिया। जब वो सुपरस्टार बन गए तो उनकी कोशिश रहती थी कि उनके लिए हमेशा गाने मैं ही लिखूं।

खैर, बात ये है कि मैं जितेंद्र को हिंदी सिखाकर अपना खर्चा चलाता रहा और हिंदी फिल्मों में गाने लिखने की मेरी कोशिश जारी रही। 1963 में बाबू भाई मिस्त्री ने एक नए म्यूजिक डायरेक्टर को ब्रेक दिया। उनका नाम था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। उसमें ज्यादातर गाने असद भोपाली साहब और फारुख कैसर के थे, पर एक गाना मुझे भी लिखने को मिल गया। मैंने सोचा कि मैं इस बार गाना इतने अच्छे, रूमानी शब्दों में, उर्दू के अल्फाज इस्तेमाल करके लिखूं कि सबको लगे कि मैं भी बाकी शायरों के स्तर का शायर हूं। मैंने जो गाना लिखा, वह हिट हो गया। उस गाने के बोल थे- ‘रोशन तुम्हीं से दुनिया, रोशन तुम्हीं जहां की, फूलों में पलने वाली रानी हो गुलिस्तां की, सलामत रहो।’ इस गाने के जरिये लोगों को ये भी समझ में आ गया कि मैं उर्दू में भी गाने लिख सकता हूं। यह गाना खूब चला, मगर उस वक्त इंडस्ट्री में साहिर लुधियानवी, शकील बदायूनी, राजा मेहंदी अली खां, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी, ये सब इतने बड़े और काबिल शायर थे कि मेरी कहीं गिनती ही नहीं हो रही थी।

फिर 1965 में मुझे ‘हिमालय की गोद में’ के लिए एक गाना मिला, जिसके बोल थे “एक तू न मिला, सारी दुनिया मिले भी तो क्या है’। इस गाने के लिए मैं फिल्मफेयर में नॉमिनेट भी हुआ, मगर कॅरियर में कोई फर्क नहीं पड़ा। फिर 1968 में आई ‘सरस्वतीचंद्र’। उसके सारे गाने सुपर-डुपर हिट हुए – “चंदन सा बदन चंचल चितवन’, “फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है’, “मैं तो छोड़ चली बाबुल का देस’। इन गानों ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया। इसके बाद कहीं जाकर मेरा स्ट्रगल खत्म हुआ। तब तक आनंद बक्शी की भी जबरदस्त एंट्री हो चुकी थी। अब मेरा संघर्ष काम पाने का नहीं, बल्कि इन सब बड़े गीतकारों से भी अच्छा गाना लिखने का था। सरस्वतीचंद्र के बाद ‘सुहागरात’ आई। उसके गाने सुपरहिट रहे। फिर ‘अनोखी रात’ आई। इसके भी सारे के सारे गाने हिट रहे। इसके गाने “ओह रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना…’। इस गाने के लिए मुझे साहिर और मजरूह साहब ने कहा कि तुम शायरी के साथ-साथ फिलोसॉफी भी लिख रहे हो इंदीवर। मुझे सोचकर बहुत खुशी हुई कि इससे बड़ा कॉम्प्लिमेंट और क्या मिलेगा।

1976 में इंदीवर जी को फिल्म ‘अमानुष’ के लिए फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला था। इसी बात पर मुझे नीरज जी का एक शेर याद आ रहा है – समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है, जला के अपना ही घर, हमने रोशनी की है… इंदीवर जी के काफी सारे गाने मेरे भी पसंदीदा थे। तो मैंने एक बार इंदीवर जी से पूछा कि आपने इतनी अच्छी शायरी की है- “चंदा चले, चले रे तारा, तुझको चलना होगा…’, “जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए, तुम देना साथ मेरा…’ । इतने अच्छे-अच्छे गीत लिखने के बाद भी आपको इस तरह के गाने कि “एक आंख मारु तो रास्ता रुक जाए’, ‘ओ ताकि ओ ताकि…’, लिखने की क्या जरूरत थी?

इस पर उन्होंने कहा कि बेटा, तू ये कार्टर रोड पर मेरे फ्लैट में आता है, खिड़की से बाहर समंदर देखता रहता है और बोलता है – वाह इंदीवर जी, आप तो स्टार हों, क्या शानदार घर है आपका। तू मेरी गाड़ी में बैठता है और बोलता है वाह इंदीवर जी, क्या गाड़ी है आपकी (उस वक्त लेखकों और गीतकारों में सिर्फ इंदीवर जी के पास ही इम्पोर्टेड कार थी)। ये सब चीजें तुझे पसंद आती हैं, जो इसी तरह के गानों से बनी हैं। मेरा काम है जो प्रोड्यूसर की डिमांड हो, उसको लिखकर देना।

इंदीवर जी ने फिरोज खान के लिए गाना लिखा था – “आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए’, जिसने पूरे हिंदुस्तान में उस साल तहलका मचा दिया था। उसके बाद मनोज कुमार ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। उपकार और पूरब पश्चिम जैसी फिल्मों में सुपर हिट गाने लिखवाए। तो आज इंदीवर जी की याद में मनोज कुमार की फिल्म का ये गीत सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए। है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं…



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