देवदत्त पट्टनायक5 घंटे पहले
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तमिलनाडु के कुम्भकोणम में भी हर 12 साल में कुम्भ की तरह का एक आयोजन होता है, जिसे ‘महामहम’ कहते हैं। इसमें एक पवित्र तालाब महामहम में डुबकी लगाई जाती है। पिछली बार यह साल 2016 में हुआ था। अगली बार 2028 में आयोजित होगा।
कुम्भ मेले का अमृत के ‘कुम्भ’ के साथ संबंध हाल ही में प्रचलित किया गया है। अब राशिचक्र के बजाय कुम्भ देवों और असुरों द्वारा किए गए क्षीरसागर के मंथन से उभरने वाले अमृत को उल्लिखित करता है। कहते हैं कि अमृत की बूंदें इन तीर्थस्थलों पर गिरीं। सूर्य, चंद्र तथा गुरु ग्रह के चलन अनुसार वे विशिष्ट समय पर सक्रिय बनती हैं।
समुद्र-मंथन की कथा वेदों से नहीं, बल्कि महाभारत से आई है। उसकी छवियां भारत में नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाई जाती हैं। वेदों में उल्लेख है कि कैसे एक बाज मनु तक सोम ले गया और कैसे मनु ने इंद्र के लिए सोमरस बनाया। प्राचीन ग्रंथों में समुद्र-मंथन का उल्लेख नहीं है।
औपनिवेशिक काल से इन मेलों की हिंदू पहचान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है और यही कारण है कि आधुनिक काल में भी राजनीतिज्ञ उन्हें इतना बढ़ावा देते हैं। नागा साधुओं के अखाड़े और कुछ साल पहले स्थापित किए गए किन्नर अखाड़े के बारे में काफी लाेग जानते हैं, लेकिन महिलाओं के अखाड़े की बात कोई नहीं करता। कुछ वर्ष पहले तो उसे स्थापित करने के प्रयासों का भी विरोध किया गया था।
बौद्ध और जैन धर्मों की तरह हिंदू धर्म में भी मठों पर पुरुषों का ही नियंत्रण रहा है। मठवासिनियों का कम दर्जा होता है, जिनमें से अधिकतर परित्यक्त विधवाएं होती हैं। इन मठों का यह मानना होता है कि महिलाओं में रजोधर्म होने के कारण जादुई शक्ति नहीं होती है, जबकि पुरुषों में ब्रह्मचर्य के कारण यह शक्ति होती है। इसलिए तपस्वियों को सबसे पहले पानी में स्नान करने को कहा जाता है, ताकि वह उनकी शक्ति से प्रबल बन सके। ब्रह्मचर्य के कारण पुरुषों में सिद्धि शक्तियां निर्मित होती हैं, इस विचार की तांत्रिक जड़ें हैं और इसलिए वह शिव तथा हनुमान से जुड़ा है।
इन मेलों का एक विशिष्ट उत्तर भारतीय स्वरूप है। उत्तर भारतीयों में शायद बहुत कम लोग दक्षिण भारत के कुम्भकोणम के मेले के बारे में जानते होंगे। कर्क रेखा के दक्षिण के भाग को दक्षिण भारत माना गया है। परंपरागत रूप से इस रेखा के उत्तर में स्थित क्षेत्र को आर्यावर्त माना जाता था, जहां परछाई हमेशा उत्तर की ओर पड़ती है। 500 ईस्वी के बाद मनुस्मृति सहित अन्य ग्रंथों ने दक्षिण के भाग का भी आर्यावर्त में समावेश किया और वह हिमालय की शृंखला से लेकर समुद्र तक फैल गया। कथाओं के अनुसार ऋषियों ने अपने साथ पहाड़ और नदियां ले जाकर दक्षिण की ओर यात्रा की। सप्त-सिंधु न केवल सिंधु, गंगा और उनकी उप-नदियां थीं, बल्कि अब उसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों का समावेश भी किया गया।
कुम्भ मेले से स्पष्ट है कि हिंदू धर्म में परंपरा अनुसार अनुष्ठान करना आस्था से अधिक महत्वपूर्ण है। सही समय पर जल में डुबकी लगाना महत्वपूर्ण है, ताकि आस्था की घोषणा की जा सकें। इसके पीछे के कारणों, इसकी व्याख्याओं और उससे जुड़ीं कथाएं बाद में आती हैं।
मठवासी और राजा इन मेलों में मिलकर अपने मतभेद सुलझाते थे और अपने उत्तराधिकारी चुनते थे। मठवासी परंपराएं आमतौर पर समतावादी नहीं होती हैं। उनमें राजनीतिक और आर्थिक शक्ति होने के कारण मंडलेश्वर और महा-मंडलेश्वर जैसे वर्गीकरण होते हैं। ये वर्गीकरण राजा तथा महाराजा और राणा तथा महाराणा के वर्गीकरणों जैसे होते हैं। इसलिए विशेषकर 1857 के बाद अंग्रेज इन मेलों को लेकर चिंतित हुए। उन्हें आशंका थी कि कहीं इनके जरिए 1857 के विद्रोह जैसे और विद्रोह ना खड़े हो जाएं। लेकिन मठवासियों ने दावा किया कि इन मेलों का राजनीति से कोई-लेना देना नहीं था और वे केवल धार्मिक थे। इस प्रकार, अंग्रेज अधिकारियों के विरोध और रोकने के कई प्रयासों के बावजूद उनका आयोजन होता रहा और रेल सेवाओं तथा समाचार-पत्रों के आने से बढ़ते गए।
इस प्रकार, कुम्भ मेले आकाशीय संरेखण, नदियों के संगम और मठवासियों के सम्मिलित होने से जुड़े हैं। क्या उनमें भाग लेने से अमरत्व प्राप्त होता है? संभवतः राजनीतिज्ञ ऐसा ही चाहते हों, लेकिन प्रकृति को उन पर हंसी आती होगी।








