13 घंटे पहले
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- पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को बीसीसीआई ने हाल ही में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया है। उनके शानदार सफर की कुछ प्रेरक बातें, उन्हीं की जुबानी…
मेरे बड़े भाई ने मुझे अनुशासित और केंद्रित जीवन जीने का महत्व समझाया था। हमेशा मुझे और मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। यहां तक कि मेरे करियर के अंत तक मैं उसी फॉर्मूले का पालन करता रहा। अगर मैं रन बनाता था, तो दुनिया को उसकी चर्चा करने देता था, लेकिन मैं अगले मैच के बारे में सोचता था। मेरे स्कूल के दिनों से ही घर पर एक नियम सा बन गया था कि हम पिछले मैच की कोई बात नहीं करेंगे, केवल अगले मैच की तैयारी करेंगे।
चाहे मैंने कितने भी रन बनाए हों, मेरी इच्छा फिर भी होती थी कि मैं और ज्यादा रन बनाऊं। अगर मैं रन नहीं बना पाता था, तो मेरी रात खूब बेचैनी में गुजरती थी। अगर रन बना भी लेता, तो भी यह सोचकर रात कटती थी कि अगले मैच में कैसे बेहतर प्रदर्शन करूं। इसमें मेरे भाई और मेरे कोच का बड़ा योगदान था क्योंकि हर बार जब मैंने रन बनाए, तब भी उन्होंने मुझे कोई शाबाशी नहीं दी। इसी कारण अपनी फेयरवेल स्पीच में मैंने अपने कोच से कहा कि अब तो आप शाबाश कह सकते हैं, क्योंकि अब मेरे करियर में और कोई मैच नहीं है। लेकिन कुछ ऐसा जो मुझे हमेशा प्रेरित करता रहा, वह थी मेरे कोच और भाई से सराहना पाने की इच्छा, जो कभी पूरी नहीं हुई। यही चीज मुझे लगातार अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित भी करती रही।
मेरे लिए हमेशा एक सरल नियम था, अपने काम पर ध्यान केंद्रित करो और बाकी सब चीजें अपने आप ही हो जाएंगी। लोग बातें करेंगे, मैं आगे बढ़ता रहूंगा। स्कूल के दिनों से ही मैंने यही किया है। अगर आपकी ऊर्जा कई दिशाओं में बंट जाती है, तो आप अच्छे परिणाम हासिल नहीं कर पाते हैं। आपको यह जानना जरूरी है कि कब ध्यान लगाना है और कब ध्यान को हटाना है। आपका काम हमेशा आपकी प्राथमिकता में रहे, बाकी सब पृष्ठभूमि में रहे।
मुझे नहीं लगता कि किसी एक सुबह उठकर मुझे यह एहसास हुआ था कि मुझ पर यह जिम्मेदारी है और मुझे उन उम्मीदों पर खरा उतरना है। दरअसल, मेरी बेचैनी ने मुझे हमेशा अच्छे परफॉर्मेंस के लिए धकेला। बेचैनी ही मुझे सबसे अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती है, मेरे लिए यह एक स्वस्थ संकेत रहा। मेरे करियर की शुरुआत में, जब मैं रात में बिस्तर पर करवटें बदलता रहता था, तो मैं इस बेचैनी से लड़ता था और सोने की कोशिश करता था। फिर कुछ साल बाद ही मुझे पता चला था कि यह बेहद सामान्य है, तो मैं उठकर टीवी देखता या कुछ और करता था। मुझे एहसास हुआ कि दरअसल यह सिर्फ मेरा अवचेतन मन है, जो खेल के लिए तैयार हो रहा है। यह खुद को समझने की बात है, और वक्त के साथ आप खुद को बेहतर जानने लगते हैं।
काम का आनंद लेना नहीं भूलना चाहिए इतना कुछ होता है मैदान पर और बाहर कि कभी-कभी आप खेल का आनंद लेना ही भूल जाते हैं। यह होना नहीं चाहिए। जब ऐसा होता है, तो आपका काम ठीक नहीं चल सकता। मुझे यह एहसास 2006 में हुआ, जब मैंने अपनी कंधे की सर्जरी के बाद कुछ प्रैक्टिस मैच खेले। मैं सिर्फ क्रिकेट का आनंद ले रहा था। अब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि उन मैचों को खेलना मेरे लिए महत्वपूर्ण था। वह मेरे लिए एक बदलाव था। (तमाम इंटरव्यूज में सचिन तेंदुलकर)








