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एक सींग वाला गैंडा असम का राजकीय प्राणी है। तराई क्षेत्र की लोककथाओं के अनुसार, दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने हाथी की त्वचा, घोड़े के खुर, मगरमच्छ की आंखें, भालू के मस्तिष्क, सिंह के हृदय और वृषभ के सींग को मिलाकर गैंडे की रचना की थी।
लगभग 4,500 वर्ष पूर्व सिंधु नदी के उत्तर-पश्चिमी तट पर हड़प्पा सभ्यता विकसित हुई। वहां की अनेक मुहरों पर गैंडे की आकृतियां मिली हैं। इससे संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में गैंडा भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी क्षेत्रों में भी पाया जाता था, जहां उस समय आज की तुलना में अधिक हरियाली और नमी थी। हड़प्पा की कुछ मुहरों पर एक रहस्यमय एकल सींग वाला प्राणी भी दिखाई देता है। यह पश्चिमी मिथकों में उल्लिखित एक सींग वाले अश्व से भिन्न है। गैंडा तो वास्तविक प्राणी है, लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मुहरों पर अंकित यह एकल सींग वाला जीव वास्तविक था या केवल कल्पना की उपज।
ऋग्वेद में गैंडे का उल्लेख ‘खड्ग’ नाम से मिलता है। अर्जुन के प्रसिद्ध धनुष ‘गाण्डीव’ का संबंध भी संस्कृत में गैंडे के लिए प्रयुक्त शब्द ‘गण्डक’ से जोड़ा जाता है। इससे प्रतीत होता है कि आर्य योद्धाओं के लिए मोटी चमड़ी और नुकीले सींग वाला यह पशु विशेष महत्व रखता था। गैंडे की खाल अत्यंत मजबूत और लगभग अभेद्य मानी जाती थी। संभवतः यही कारण था कि उस समय के योद्धा इसकी खाल से बने कवच धारण करते थे। भगवद्गीता के एक श्लोक में कृष्ण स्वयं को ‘एकशृंग’ अर्थात एक सींग वाले जीव के रूप में संबोधित करते हैं। इसी कारण कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि कहीं विष्णु का वराह अवतार वास्तव में गैंडे से प्रेरित तो नहीं था।
जैन परंपरा में भी गैंडे का उल्लेख मिलता है। वह ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का प्रतीक चिह्न है। बौद्ध धर्म के ‘खग्गविसाण सुत्त’ में गैंडे के एकमात्र सींग को एकांतवासी भिक्षु के आदर्श जीवन का रूपक बनाया गया है। उसमें कहा गया है – ‘गैंडे के सींग की भांति अकेले विचरण करो। उत्कंठा से मुक्त, सांसारिक छल, प्रेम और इंद्रिय सुखों में रुचि न लेते हुए, अलंकरण से दूर रहते हुए, सदैव सत्य बोलें और खग्ग समान अकेले भटकते रहें!’
गुजरात में पूजी जाने वाली लोकदेवी धावडी माता का वाहन भी गैंडा है। उल्लेखनीय है कि हड़प्पा सभ्यता की कई मुहरें भी इसी क्षेत्र के आसपास प्राप्त हुई हैं। यह इस बात का संकेत है कि प्राचीन काल में भारत के पश्चिमी भाग में गैंडा एक प्रमुख प्राणी हुआ करता था। उस समय की यादों ने गैंडे की मुहरों और धावडी माता के वाहन का रूप ले लिया। धावडी माता की पूजा गुजरात के साथ-साथ पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में भी घुमक्कड़ समुदायों द्वारा की जाती है।
लोकमहाभारत की कुछ कथाओं में भी गैंडे का उल्लेख मिलता है। एक कथा के अनुसार, पांडवों ने अपने पिता पांडु की आत्मा की शांति के लिए एक दिव्य गैंडे का शिकार किया था। मान्यता थी कि उसके मांस की आहुति दिए बिना पांडु को स्वर्ग प्राप्त नहीं हो सकता था।
गढ़वाल की ‘पांडव लीला’ में यह कथा कुछ अलग रूप में मिलती है। वहां कहा गया है कि पांडवों को यह गैंडा इंद्रलोक में मिला था। दूसरी ओर, सारला दास की ओड़िया महाभारत के अनुसार, यह गैंडा शिव के दिव्य उपवन में विचरण करता था। अर्जुन ने उसका शिकार किया, किंतु बाद में उसका सामना उस उपवन के रक्षक से हुआ। आश्चर्य की बात यह थी कि वह रक्षक अर्जुन का ही पुत्र था, जिसे एक नागकन्या ने जन्म दिया था। लोककथाओं में इस पुत्र को नागार्जुन के नाम से जाना जाता है और अनेक क्षेत्रों में उसकी विशेष श्रद्धा के साथ पूजा की जाती है।
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