रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:  थिएटर करने के भी इच्छुक थे सुशांत सिंह
अअनुबंधित

रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से: थिएटर करने के भी इच्छुक थे सुशांत सिंह

Spread the love




आज ही का वो मनहूस दिन है, जिस दिन हमारे देश और फिल्म इंडस्ट्री ने अपने सबसे अच्छे अभिनेताओं में से एक को खो दिया था। मेरे लिए तो वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि छोटे भाई जैसा, मेरे दिल के बहुत करीब और मेरा हीरो था – सुशांत सिंह राजपूत। यह 14 जून 2020 की तारीख थी। लॉकडाउन की वजह से सबके घर किसी जेल की तरह बन गए थे, जहां लोग एक अनचाही, बिना मांगी और बिना दी हुई कुदरत की तरफ से मिली सजा भुगत रहे थे। मिलना-जुलना, आना-जाना सब बंद था। ऐसे में सुशांत के जाने की खबर ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। मेरे पूरे परिवार का रो-रोकर बुरा हाल था। यहां तक कि मेरे घर पर काम करने वाले लोग भी इस खबर से एकदम से टूट गए थे। सुशांत के अंतिम दर्शन भी सिर्फ टीवी पर ही नसीब हुए। मैंने एक-दो लोगों को फोन करके अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति भी मांगी, लेकिन मुझे मना कर दिया गया। इस तारीख के आने से पहले ही सुशांत की यादें आनी शुरू हो जाती हैं। उसके साथ बिताया हुआ हर पल, हर लम्हा मेरी सबसे कीमती दौलतों में से एक है। उसकी हर स्मृति आंखों के सामने तैरने लगती है। ऐसे में कैसर-उल-जाफ़री का एक शेर याद आता है : यादों का एक झोंका आया, हमसे मिलने बरसों बाद
पहले इतना रोए न थे, जितना रोए बरसों बाद। दरअसल, सुशांत और मेरे बीच एक कॉमन चीज थी, जिसकी वजह से हम दोनों पहली मुलाकात में ही दोस्त बन गए थे। 1990 के दशक में मैंने नादिरा बब्बर जी के थिएटर ग्रुप ‘एकजुट’ में दो नाटक किए थे। वही नाटक बाद में सुशांत ने भी किए। जब वह पहली बार मुझसे मिला तो उसने कहा, ‘जब मैंने ‘एकजुट’ थिएटर जॉइन किया और ‘एक घोड़ा तीन सवार’ की रिहर्सल में गया तो वहां आपकी बहुत बातें होती थीं। आपके इतने किस्से सुन रखे हैं कि ऐसा लगता है कि भले ही मैं आपसे मिल आज रहा हूं, लेकिन आपको बहुत पहले से जानता हूं।’ बस फिर क्या था। इसके बाद से हमारी खूब पटने लगी। फिर मेरी फिल्म ‘चेहरे’ शुरू हो गई। एक दिन सुशांत ने मुझसे कहा, ‘सर, अमिताभ बच्चन जी, अन्नू कपूर जी, रघुबीर यादव जी, धृतिमान चटर्जी, ये सब हिंदुस्तान के लेजेंड एक्टर हैं। इन्हें एक्टिंग करते हुए देखना अपने आप में एक एक्टिंग क्लास है। मैं आपको डिस्टर्ब नहीं करूंगा, लेकिन मुझे इजाजत दीजिए कि मैं आपके सेट पर आकर चुपचाप इन लोगों की एक्टिंग देख सकूं।’ और सचमुच, वह अक्सर सेट के किसी कोने में चुपचाप बैठकर शूटिंग देखा करता था। फिर एक दिन मैंने उसे बताया कि हमने 1987 में अन्नू भाई, यानी अनु कपूर जी के साथ ‘लैला मजनूं’ नाटक किया था। वह पारसी थिएटर शैली का नाटक था, जिसमें संवाद पोएट्री में होते थे और गाने भी होते थे। मैंने उसे उस नाटक के कुछ गाने और संवाद सुनाए तो उसको बहुत पसंद आए। उसने जिद पकड़ ली, ‘मैं यही नाटक करूंगा। इसमें म्यूजिक है, पोएट्री है, डायलॉग्स हैं, गाने हैं। मैं यही करूंगा।’ फिर मैंने उसे अन्नू भाई से मिलवाया। ‘लैला मजनूं’ को लेकर हमारी तीन-चार मीटिंग्स और बैठकों का दौर चला। पूरा डिस्कशन हो गया, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि इस नाटक की तो सिर्फ रिहर्सल में ही तीन महीने लग जाएंगे। मैं सोचने लगा कि सुशांत इतना बड़ा स्टार है। उसका एक-एक दिन कीमती है। इतने समय में तो वह दो फिल्में पूरी कर सकता है। फिर मैंने उसे समझाया कि यह उसके लिए नुकसान का सौदा होगा। तब उसने कहा, ‘ठीक है सर, फिर एक काम करते हैं। मुझे आपके साथ काम करना है। हम लोग एक फिल्म करते हैं। मुझे आपकी ‘हीरो नंबर वन’ बहुत पसंद है। ऐसा ही कोई सब्जेक्ट, ऐसा ही कोई रोल आप मेरे लिए लिखिए और हम फिल्म शुरू करते हैं।’ फिर मैंने एक किरदार तैयार किया, विषय तैयार किया, स्क्रिप्ट लिखी। सब कुछ तय हो गया। हम लोग घर पर बैठकर स्क्रिप्ट की रीडिंग करने लगे। रीडिंग पूरी हो गई। यह सुशांत की सबसे पसंदीदा स्क्रिप्ट्स में से एक बन गई थी। उसने मुझसे कहा था, ‘इस फिल्म की रिलीज तक मैं कोई और फिल्म नहीं करूंगा।’ लेकिन अफसोस… फिल्म शुरू होने से पहले ही सुशांत हम सबको छोड़कर चला गया। उसके जाने का दर्द और तकलीफ हमारे दिलों में हमेशा रहेगी। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि सुशांत हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा। सुशांत की याद में उसकी फिल्म ‘एम.एस. धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी’ का यह गीत सुनिए, अपना ख्याल रखिए, खुश रहिए : ‘बेसब्रियां… बेसब्रियां… बेसब्रियां…’



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *