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फिल्मकार स्पीलबर्ग ने हाल ही में अपनी डॉक्यूमेंट्री के लिए ग्रैमी हासिल किया है। उनकी एक अलग जॉनर के दौरान का किस्सा जिसमें उन्होंने सपनों को हासिल करने की जद्दोजहद बयां की है… मैं आपसे एक सवाल शेयर करना चाहता हूं, जो मैंने खुद से जिंदगी में अनगिनत बार पूछा है कि मैं आखिर ‘वेस्ट साइड स्टोरी’ क्यों बनाना चाहता था? जवाब बड़ा सीधा है। क्योंकि यह मेरी जिंदगी का हिस्सा रही है। जब मैं सिर्फ 10 साल का था, तब मैंने इसका ओरिजिनल ब्रॉडवे कास्ट एल्बम सुना था। फिर 1961 की फिल्म देखी… रॉबर्ट वाइज और जेरी रॉबिन्स की वो क्लासिक, जिसे कोई दोहरा नहीं सकता। उसके बाद सालों तक जितने भी स्टेज शो देखे, हर बार लगा कि यही मेरी सबसे पसंदीदा म्यूजिकल है। इसका संगीत मेरी जिंदगी में रचा-बसा है। जब किसी पिता को कोई चीज पसंद आती है, तो वो उसे बच्चों से भी शेयर करता है। मैंने भी यही किया। बच्चों के लिए मैं उसे गुनगुनाने लगाया, डायलॉग याद करवाए। वीकेंड पर वीडियो कैमरा ऑन करके हम सब किरदार निभाते थे। तब नहीं पता था कि ये सब एक फिल्म का रास्ता बनाएगा। लेकिन मोह और कमिटमेंट में फर्क होता है। फैसला धीरे-धीरे हुआ। मैंने करीबी लोगों से पूछा कि क्या यह फिल्म बनाना चाहिए? जब ‘हां’ मिलने लगी, तब हिम्मत आई। मुझे लगा कि आज की पीढ़ी ने शायद ‘वेस्ट साइड स्टोरी’ सुनी ही नहीं है। यही वो पीढ़ी है, जिससे मैं बात करना चाहता हूं। 64 साल पुरानी कहानी आज भी जिंदा है। शुरुआत में लगा मैं ये कर लूंगा… पर जल्द ही समझ आया कि ऑडियंस होना और म्यूजिकल डायरेक्ट करना, दो अलग चीजें हैं। मैंने सीखना शुरू किया। कई महीने डांस रिहर्सल चली। सब मिलकर समझा रहे थे कि डांस ही कहानी है। कहानी गाने में चलती है। बोल, संगीत, किरदारों की चाल… सब मिलकर नैरेटिव बनाते हैं। मैं हर रिहर्सल को रिकॉर्ड करता था, जब तक भरोसा न हो कि मैं ये कर सकता हूं। बड़ी चुनौती थी। मैंने स्वीकार किया और वहीं से ग्रो किया। सीखा कि म्यूजिकल सिर्फ कला नहीं, विज्ञान भी है। जिंदगी में मुझे अच्छे मेंटर्स मिले। जिन्होंने सिखाया सरप्राइज देना, सरप्राइज लेना। यही मैं करता हूं क्योंकि सिनेमा सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं है। ये भरोसा है। धैर्य है। ये मानना है कि सीखना कभी खत्म नहीं होता। अगर आप किसी चीज से प्यार करते हैं, तो उसे जिएं। एक दिन आपको वही कहानी सुनाने का मौका मिलेगा, जो आप सालों से अपने दिल में दोहराते आ रहे हैं। कल वो सपना भी पूरा होगा, जो आज दूर लगता है
कभी-कभी सपने जोर से नहीं बोलते, वे बस धीरे-से कान में फुसफुसाते हैं। उन्हें सुनना आसान नहीं होता, इसलिए जिंदगी के हर दिन में हमें इतना तैयार रहना चाहिए कि उन धीमी आवाजों को सुन सकें। शायद इन्हीं आवाजों से मेरे भीतर की कल्पना कभी रुकती नहीं है। मैं इतनी उत्सुकता के साथ सुबह उठता हूं कि कई बार नाश्ता तक करना भी भूल जाता हूं। सपनों की कोई मियाद नहीं होती। उन्हें वक्त दें। कल वह सपना भी पूरा होगा, जो आज पहुंच से बेहद दूर महसूस होता है। अपने सपनों पर भरोसा रखें, क्योंकि वही धीरे-धीरे आपकी मंजिल बन जाते हैं। (तमाम इंटरव्यूज में)
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