सेल्फ हेल्प किताबों से:  देना, स्वयं को कम करना नहीं
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सेल्फ हेल्प किताबों से: देना, स्वयं को कम करना नहीं

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10 घंटे पहले

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  • किताबों से जानिए, क्यों यह स्वीकारना चाहिए कि कुछ आपमें भी परफेक्ट नहीं है? समृद्ध जीवन जीने के लिए किनका खुले दिल से स्वागत से करना चाहिए?

हमें खुद के प्रति भी थोड़ा प्रेम भाव रखना चाहिए जब आप अपने भीतर की उन बातों को स्वीकार करना शुरू करते हैं, जो परफेक्ट नहीं हैं, तो आप अपने भीतर की सकारात्मक बातों को भी देखने लगते हैं- ऐसे गुण जिन्हें आपने कभी अपने भीतर पहचाना ही नहीं, या जिनका श्रेय आपने खुद को कभी नहीं दिया। आप तनावग्रस्त हो सकते हैं, लेकिन आप में सुकून से रहने की क्षमता भी है। आप खुद के प्रति प्रेमपूर्ण रहें और दयालुता व गहन स्वीकृति का भाव रखें। (एक्नॉलेज द टोटैलिटी…)

देना और पाना, यह दोनों चीजें एक साथ चलती हैं देने और पाने की हमारी क्षमता ही सच्ची समृद्धि को अनुभव करने और रचने की मूल शक्ति है। देना और पाना दो विपरीत ऊर्जा हैं, जो जीवन के स्वाभाविक प्रवाह में गहराई से जुड़ी हुई हैं, जैसे सांस लेना और छोड़ना। लेना या प्राप्त करना अक्सर स्वार्थ से जुड़ा हुआ माना जाता है। जबकि वास्तव में देना और पाना दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं, और समृद्ध जीवन जीने के लिए दोनों का खुले दिल से स्वागत जरूरी है। (गिविंग एंड रिसीविंग)

देने से आप अच्छे होते हैं, दुनिया बेहतर बनती है अक्सर हम अपना जीवन संपत्ति, धन, और प्रतिष्ठा जैसी चीजों के इर्द-गिर्द बुनते हैं। जैसे कि ये हमें और हमारे परिवारों को दुनिया की अनिश्चितताओं से बचाएंगे। हम देने को आर्थिक लेन-देन की तरह देखते हैं- जैसे कि देने से हमारे पास से कुछ कम हो रहा है। देना स्वयं को कम करना नहीं, बल्कि किसी और के जीवन में अर्थ जोड़ना है। ये हमारी इंसानियत को जागृत करता है और दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाता है। (ऑन गिविंग)

‘क्या चाहिए’ पर नहीं , ‘क्या है’ पर फोकस करें हम यह या वह चाहते हैं। अगर हमें वह नहीं मिलता जो हम चाहते हैं, तो हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं जो हमारे पास नहीं है- और असंतुष्ट बने रहते हैं। लेकिन यदि हमें वह मिल जाए जो हम चाहते हैं, तब भी हम उसी सोच को दोहराते हैं। इच्छाएं पूरी हो जाएं, फिर भी हम खुश नहीं रहते। खुशी उन इच्छाओं की पूर्ति से नहीं मिलती जो निरंतर जन्म लेती हैं, वह तब मिलती है जब हम उन्हें छोड़ना सीखते हैं। हमें अपनी सोच का फोकस ‘क्या चाहिए’ से हटाकर ‘क्या है’ पर लाना होगा। (थिंक ऑफ वॉट यू हैव)



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