इंस्पायरिंग:  फर्क नहीं पड़ता कहां से शुरू करते हैं, मायने रखता है सच्चाई से चलते रहना – ऋषभ शेट्टी
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इंस्पायरिंग: फर्क नहीं पड़ता कहां से शुरू करते हैं, मायने रखता है सच्चाई से चलते रहना – ऋषभ शेट्टी

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35 मिनट पहले

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  • एक्टर-डायरेक्टर ऋषभ शेट्टी को ‘कांतारा’ के नए संस्करण ने घर-घर में पहचान दी है। इस सफलता के पीछे की मेहनत और सोच, उन्हीं की जुबानी…

मैं कभी मुंबई के अंधेरी वेस्ट इलाके में एक प्रोडक्शन हाउस का ऑफिस बॉय था। वहीं एक प्रोड्यूसर की गाड़ी चलाया करता था। तो आप समझ सकते हैं, सिनेमा क्या कर सकता है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन एक फिल्म मुझे इतना नाम, प्यार और आशीर्वाद दिला देगी। उस प्रोडक्शन हाउस के बाहर सड़क किनारे वडापाव खाते हुए मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ये सफर मुझे इस दफ्तर के अंदर तक ले आएगा। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो बस यही कह सकता हूं… मैं बेहद आभारी हूं। पहली फिल्म ‘कांतारा’ को बने पांच साल हो चुके हैं। जब मैंने ‘कांतारा’ की शूटिंग शुरू की, तो हम सब बेंगलुरु की भागदौड़ से निकलकर कुंदापुर के एक शांत गांव में आ गए थे। मैंने तय किया था कि अगर मैं अपने परिवार से दूर रहकर शूट करूंगा, तो काम में वो आत्मा नहीं रहेगी जो मैं चाहता था। इसलिए मैंने पूरी टीम के साथ अपना परिवार भी वहीं शिफ्ट कर लिया। मेरे बच्चे वहीं उस गांव में पैदा हुए, जहां हमने ‘कांतारा’ की शूटिंग की थी। आज भी वो उसी गांव के स्कूल में पढ़ते हैं। मेरे लिए यह एक यात्रा रही… गांव की मिट्टी से लेकर सिनेमाई दुनिया तक और फिर वापस उसी मिट्टी की गोद में लौटने की। अब जब फिल्म पूरी हो गई है, हम सोच रहे हैं कि बच्चों की पढ़ाई यहीं जारी रखनी है या फिर बेंगलुरु लौटना है। लेकिन दिल में कहीं न कहीं महसूस होता है कि यह गांव, यह सादगी, यह ऊर्जा… मेरे परिवार का हिस्सा बन चुकी है। लोग कहते हैं कि मुझे अपनी सफलता का एहसास हुआ होगा, पर सच कहूं तो अभी तक नहीं हुआ। मुझे न तो अत्यधिक खुशी है और न ही कोई बड़ी उम्मीदें पालता हूं। मैं बस अपना काम करता हूं। लेकिन ‘कांतारा’ की सफलता के बाद एक पल ऐसा जरूर आया, जब मुझे भीतर से कुछ भारी महसूस हुआ। मैं मुंबई में था, फिल्म के हिंदी वर्जन की रिलीज से दो-तीन दिन पहले। अचानक एक अंजाना एहसास हुआ कि यह सफलता वो नहीं है, जिसके लिए मैं इतने सालों से मेहनत कर रहा था। मैं सिनेमा में पिछले 18 साल से हूं, पर कभी ‘सफलता’ के पीछे नहीं भागा। काम इसलिए करता हूं क्योंकि मुझे उसमें आनंद मिलता है। यही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। आज भी जब मैं उस प्रोडक्शन हाउस के बाहर खाए गए वडा पाव को याद करता हूं, तो मुस्करा देता हूं। बस यही कहना चाहता हूं… कभी अपनी शुरुआत को छोटा न समझें क्योंकि ईश्वर को फर्क नहीं पड़ता तुम कहां से शुरू करते हो, उसे फर्क पड़ता है कि आप कितनी सच्चाई से चलते रहते हैं।

जीवन नदी की तरह है, इसे रोकें नहीं… बहने दें जब लोग पूछते हैं कि मैं अब आगे क्या चाहता हूं, तो मेरा जवाब बहुत सरल होता है कि मैं बस बहाव के साथ चलता हूं। जिंदगी नदी की तरह है, अगर आप उसे जबरदस्ती रोकने जाएंगे, तो वह ठहर जाएगी। लेकिन अगर उसे बहने देंगे, तो वह अपने आप मंजिल तक पहुंच जाएगी। ‘कांतारा’ मेरे लिए एक फिल्म नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार है। उस पुकार ने मुझे यह समझा दिया है कि चाहे आपका सफर कितना भी कठिन क्यों न हो, अगर आप ईमानदारी से मेहनत करते रहते हैं, तो ब्रह्मांड आपके लिए अपने आप ही रास्ता बना देता है। (तमाम इंटरव्यू में…)



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